Saturday, 26 May 2018

सोच का इम्तिहान...


कभी कभी सोचता हूं
की मर्द होना कितना बड़ा पाप है।
फिर सोचता हूँ रहने दो अम्मा के 8, 10 व्रत लड़के की चाह वाले बेकार हो जायेगे।


सोच दो तरह की होती है.
एक सोच
जिसने ने ललिता के ऊपर तेजाब फेंका उसकी जिंदगी जला दी
दूसरी सोच
राहुल जिसने ललिता के शरीर पर गिरे तेजाब को अपनी जिंदगी बना ली।


दोनों में फर्क क्या था सोच क्या थी पता नहीं
लेकिन सोच ही सोच को मात दे सकती है ये समझ आया.
पहले वाले की सोच को दूसरे वाले ने अपनी सोच से मात दी.


जैसे रावण की सोच को राम की सोच ने मात दी थी
सुपनखा की सोच को सीता की सोच ने मात दी थी
सुपनखा अपने सौन्दर्य से लखन को जीतन चाहती थी
वहीं सीता अंतिम समय तक बस राम की बनके रहना चाहती थी
सीता की सोच लंका के विध्वंस के साथ जीती और सुपनखा की सोच पूरी राक्षस जाति के अंत से।


कहीं एक बाप सारी उम्र इसलिए मेहनत कर रहा ताकि वो अपनी बेटी को डोली में बिठा के गाजे बाजे के साथ विदा कर सके,
और कहीं कोई बाप अपनी बेटी को बंद कमरे में रौंद रहा होता है.
आग दोनों में है,
कहीं आग अपनी बेटी आबाद करने की लगी है
तो आग कहीं अपने बेटी को बर्बाद करने की आग लगी है
सोच दोनों की है। लेकिन यहां भी किसी की आग, किसी की आग भारी पड़ी।


सब सोच का खेल है,
आज रात भी आपकी सोच का इम्तिहान होगा
आज भी एक लड़की तुम्हे सुनसान गली पार करते मिलेगी
सोच होगी तो उसे घर तक छोड़ आना
और सोच हुई तो उसे कही ले जाके उसे रौंद आना।

लेकिन इतना याद रखना तुम्हारी हर एक सोच पर कभी न कभी किसी की सोच भारी पड़ेगी
और तब तुम्हें तुम्हारी सोच ही धिक्कारेगी
और तुम कुछ नहीं कर पाओगे।

गुलाब...

उन्होंने कहा, पूरे अमीनाबाद के लड़के हमपर मरते हैं तुम मानो न मानो वो हमसे बे-पनाह मोहब्ब्त करते हैं और अगर दराख से झुमका भी दिखा दूं तो ...