इस घर में मेरी बात तो कोई समझता ही नहीं. माँ भी पापा के आगे कुछ नहीं बोल पाती मेरी परेशानी, मेरा दर्द तो कोई समझता ही नहीं. कुछ दिनों के लिए कही चला ही जाता हूँ जब नहीं रहूँगा तो सबको मेरी क़द्र होगी.
और मैं अपने इन्ही सब दर्द को लेकर निकल गया घर से, अनजान सी राहों पर चलता गया चलता गया. लोग मिलते गएं.
थोड़ी दूर पर एक घर दिखा, घर के सामने दिखी कुछ लोगों की भीड़. वहां सभी को रोते हुए देखा तो तुरंत समझ आ गया कि कोई आज रुखसत हो गया इस जहां से. यूं तो यहां सबकी आंखों में पानी था, लेकिन आंसू सिर्फ मुझे उस बूढ़ी माँ की आँखों मे दिखा. मुझे फिर मेरा दर्द याद आ गया, मैं बढ़ चला मैं वहां से आगे.
दूर एक खेत में एक नौजवान किसान दिख गया, जो अपने खेत की सौदेबाजी किसी भूमिहार से कर रहा था. दर्द दूर खड़े उसके बूढ़े पिता की आँखों मे था. लेकिन बेटे को बड़े शहर जाने से रोकने के लिए कोई ठोस विश्वास भी नहीं था. इसीलिए बूढ़ा किसान दबे पाँव आया और कांपते हुए अंगूठे से ठाप लगाकर बेटे के पास खड़ा हो गया.
लड़के ने चंद कागज़ के बण्डल लिए और बस पर बैठ दूर बड़े शहर की ओर रवाना हो गया. बूढ़ा बाप टकटकी लगा देखता रह गया. जबतक शहर वाली बस बूढ़ी आँखों से ओझल ना हो गयी. मुझे फिरसे अपना दर्द याद आ गया, और बढ़ चला मैं वहां से आगे.
लड़के ने चंद कागज़ के बण्डल लिए और बस पर बैठ दूर बड़े शहर की ओर रवाना हो गया. बूढ़ा बाप टकटकी लगा देखता रह गया. जबतक शहर वाली बस बूढ़ी आँखों से ओझल ना हो गयी. मुझे फिरसे अपना दर्द याद आ गया, और बढ़ चला मैं वहां से आगे.
तभी एक घर से किसी के चीखने चिल्लाने की आवाज़ सुनाई दी पास जाकर देखा तो, एक शराबी अपनी पत्नी से दारू के पैसे मांग रहा था. पैसे ना मिलने पर वो पत्नी को बालों से घसीटता हुआ बहार ले आया और घर से बेदखल कर दिया. घर से दो बच्चे माँ-माँ चिल्लाते हुए सड़क पर माँ के आंसू पोछने आ गए. इन बच्चो की आँखों में अपने माँ के लिए दर्द था. मुझे फिरसे मेरा दर्द याद आ गया, आगे बढ़ चला मैं.
थोड़ी दूर पर सड़क के किनारे दो बच्चे दिख गएं, सूखी जान सी थी दोनों की रूह. कुछ पैसे मांग रहे थे. बोल रहे थे भैया 3 दिन से कुछ नहीं खाया है. कुछ खाने के लिए दे दो. मैंने जेब से 100 का नोट निकाल कर उनको दे दिया जो पिछली सुबह पापा ने जेब खर्च के लिए दिए थे. खैर इनकी आँखों मे अब ख़ुशी थी. लेकिन न जाने क्यों दर्द मेरा अब थोड़ा और बढ़ चला था.अपने थोड़े से पुराने दर्द को इन सबके दर्द के सामने रखके महसूस किया तो मैंने अपने दर्द को बहुत छोटा पाया. ऐसा लगा मानों मैने अभी तक दर्द देखा ही नहीं था. और सब में, मैं कब अपना दर्द भूल गया मुझे पता ही नहीं चला.
मैं थोड़ी देर वहीं रुक अपने दर्द के बारे में सोचने लगा मेरा दर्द कितना कम था. उस माँ से, जिसने अपना जवान बेटा खो दिया था शायद उनके बुढ़ापे का सहारा था वो. उस बूढ़े बाप से, जिसने अपने संतान के हाथों अपनी संतान को बेचते देखा. उन बच्चों से, जो अपने मां के आंसू भी नहीं पोछ सकते हैं. या इन बच्चों से, जो बिना कॉफ़ी के बिना बाइक के बिना किसी चाहत के बस दो रोटी में खुश हो गएं.
शाम हो चली थी, लेकिन आज मुझे भूख नहीं लगी थी. आज बस अपने घर पहुचने की जल्दी थी. मैं अपने कदम तेजी से घर की ओर बढ़ाने लगा. घर आया तो मां ने हमेशा की तरह गुस्से से अपनी फिक्र जाहिर की. और बोलने लगी कहां था सुबह से नालायक? पूरे मुह्हाले में तलाश चुकी तुझे मैं. चल हाथ मुहँ धुल ले मैं खाना गरम कर के लाती हूं. और हां तेरे पापा ने दफ़्तर में एडवांस की बात की है. खाना खाने के बाद बैग पैक करले अपना. वहां ज्यादा उछल-कूद न करना, ध्यान रखना अपना.
और कॉफ़ी के लिए मुहँ न फुला. ले आईं हूं नई कॉफ़ी की डिब्बिया. मैं कुछ बोल नहीं पाया. मैं कुछ जवाब नहीं दे पाया, चुपचाप खाना आने का इंतजार करने लगा. लेकिन आज बहुत शूकुन था मन में. और दर्द की सही पहचान हो गयी थी मुझे, क्यूंकी मैं आज आपना थोड़ा सा दर्द कहीं छोड़ आया था, मानो बरसो बाद आज मैं घर लौट आया था.

