ऐसा कुछ खास नहीं हुआ था उस दिन, वो हमेशा की तरह पूरे एक घंटे की देरी से आई थी. उसदिन भी हमने एक दूसरे को आखरी बार की तरह गले लगाया था.
मेरे लबों से रहा नहीं गया तो हमेशा की तरह मेरे लबों ने उसके लबों को भिगाया था, कुछ खास नहीं कह सकते. उसका शर्माना आज भी पहले जैसा था.
आज भी हमेशा की तरह उसके झुमके दिन में ही चांद को चिढ़ा रहे थे. सूराज से कोई खास लेना देना होता नहीं था उन दिनों. वो अपनी रोशनी के साथ मस्त मगन रहा करता था.
बातें आज भी हमारी उसकी सहेली की बातों से शुरु हुई थी, फिर जब वो सब कह गयी, तब हमेशा की तरह मैने उसे अपने हाफ्ते भर का सरकारी कामकाज गिनाया था, खाने में आज जरुर कुछ फीकापन था, लेकिन इसमें कोई खास बात नहीं, इस मौसम में आलू का स्वाद मीठा ही होता है.
फिर वो शाम ढले घर चली गयी थी, उसके जाने के बाद मैं काफी देर वहीं बैठा रहा, उसके दिए एक झुमके को निहारता रहा और पार्क बंद करवा के घर आ गया था.
और अब मैं हर हफ्ते उसी पार्क में जाता हूं, साथ वो झुमका लिए, मुझे यकिन था, ये झुमका उसका फेवरेट है लेने आएगी, और एक कान अधूरा है उसका तो शयाद इस हफ्ते जल्दी आयेगी.
लेकिन आज इतने सालों बाद जब मैने उसके कानों में दूसरा झुमका देखा तो समझ आया कि, उसदिन
वो बाज़ार से अपने लिए दूसरे झुमके का इंतजाम करके आई थी, और उसदिन वो आलू की सब्जी और पराठे पास के दुकान से लाई थी.