Thursday, 17 August 2017

ये आग हैं...

मुझे सोशल मीडिया काफी पसंद है, और इसी से मैंने काफी कुछ सीखा भी है. लेकिन पिछले काफी दिनों से मैंने लिखना बंद कर दिया था. और सभी इसका कारण पूछ रहे थे.
लेकिन सच तो ये है की मैं अब भी लिखता हूँ, बस फेसबुक पर लिखना बंद कर दिया है, वो इसलिए क्योंकि यहाँ हर जगह हिन्दू-मुसलमान मंदिर-मस्जिद, पर तर्क चलते है
हमें हर चीज़ फेसबुक पर अपडेट करने की आदत पड़ चुकी है, बगल में खड़ा लड़का अगर किसी लड़की से बदतमीजी कर रहा तो सबसे पहले हम फेसबुक पर लाइव विडियो बनायेगे फिर कुछ बोलेगे,
अगर कोई बच्चा भूख से रो रहा है तो, सबसे पहले उसकी फोटो क्लिक करेगे तब जेब में हाथ डालके सिक्के खंगालेगे,
कुछ बुरा होता हुआ दिखेगा तो अपनी आंखे बंद करके फ़ोन की आंखे खोलेगे.
हर चीज़ बस सोशल करनी है,
भाई पहले सामाजिक बनो तो, समाज के लिए कुछ करो तो सही, ज़मीं पर थोड़ी इन्संनियत दिखाओ तो सही,
अभी हाल ही में गोरखपुर का मामला देखा, फेसबुक पर खूब हाय तौबा मची,फलाना ढमाका, लेकिन क्या हम से किसी ने गोरखपुर जाके उन बच्चो के परिवार से मिलने की कोशिश की?वहा जाके उनका दर्द बाँटना ? चाहा नहीं न ? हम बस दिखावा करते है ,
लाइक,कमेंट,तारीफ ने हमें इतना बांध दिया है की, हमारी भावनाए तक बिकाऊ हो गयी है, जो कुछ लाइक कमेंट में बिक जाते है.
ये जो पोस्ट आप कॉपी पेस्ट करते है, वो महज पोस्ट नहीं है, ये एक आग है, और
ये आग फैलाना बंद करिए, इसकी ताकत का अंदाज़ा आपको अभी नहीं है, एक बार दो बार, लगातार अगर आप कहेगे की वहा वो चल रहा घट रहा तो , वो सच हो न हो. लेकिन कुछ असर जरुर छोड़ जाती है,
और मुझे ये समझ नहीं आता की देश में इतने मुद्दे है इतनी परेशानियाँ है ,फिरभी क्यों लोग धर्म कर्म और आग पर ही क्यों टिके है? सिमटे है
लखनऊ में अगर एकदिन ढंग से बारिश हो जाये तो, पूरे शहर में नाव चलाने जैसा हाल हो जाता है.
शहर के अलग-अलग हिस्सों में आज भी इतनी गंदगी है की बिना मुह पे रुमाल रखे हम वहां से नहीं निकल सकते ,
भाई सलाद में टमाटर नहीं देता ढाबे वाला इतना सस्ता हो चला है टमाटर.

9 बजे ऑफिस के लिए निकलो तब भी बॉस से डांट पड़ ही जाती है.
ट्रैफिक भाईसाब, ट्रैफिक, ऑटो से कूद जाने का मन करता है, इतना गुस्सा आता है कभी-कभी
परेड पर जाने वाली लड़की का बलात्कार हो जाता है , नेता जी फिर से झूठे वादे में फंसा जाते है.
पानी इतना गन्दा है शहर का की ,100 रूपए का पानी खरीद के पीना पड़ता है पूरे दिन.
गाय माता पूरे शहर में पन्नी खाती, धूल फांकती नजर आती है, गौ रक्षको से हाथ जोड़ के विनती है की इनको कोई घर दीजिये, इन्हें मारने वाले कम है, ये खुद ही भूख से दर-दर भटक के मर जाती है,
सिग्नल पर गाड़ियों से ज्यादा हाथ में कटोरे पकड़े बच्चे नजर आते है, दिल रो जाता है, कितनो की भूख मिटाऊ कितनो को भगवन के सहारे छोड़ दूँ.
नौजवान आत्महत्या कर रहा है, नौकरी कहा है? मैट्रिक्स पास मुझे निशांतगंज छोड़ के आ रहा है,मीडिया में पढाई करने वाला मेरे बाल काट रहा है,
काम पर सवाल नही उठा रहा , बस एक सवाल पर सवाल उठा रहा की,क्या मेरा भी यही हाल होगा, ?
चारबाग पर खुला व्यापार नजर आता है, जहा चंद टुकड़ो के लिए, राते बिक जाती है,
ऐसे एक नही,दस हजार मुद्दे, और परेशानियाँ है, जो हिन्दू,मुसलमान,गाय मंदिर-मस्जिद के आगे दिखते ही नहीं.
अरे मत परेशां हो, आज भी गाय माता को पूजा जाता है
मस्जिद में मुसलमान से ज्यादा हिन्दू नजर आता है, गणेश पूजा के लिए चंदा एक मुसलमान भी देता नजर आता है.
मेरे ऑफिस में शबाज़ और विशाल साथ में खाना खाते नजर आते है,
ताईबा दीदी के नमाज़ लिए ऑफिस को ही हम मस्जिद बनाते है,
कही कोई खतरा नहीं हैं भाई,ज़मीनी स्तर पर सबकुछ सही है, ये फेसबुक पर इधर उधर लिखना आग फैलाना बंद करिए, इंसानियत को बस इन्सान से ही खतरा है,
और याकिन मानिये बड़ी फ़िक्र हो रही है,की कुछ दिन और युही चलता रहा तो
जहा से शुरुवात की थी हमने फिरसे वही आके रुक जायेगे,
और सच में तब आप लिख के भी कुछ नहीं कर पायेगे,
धर्म बचाने की कोशिश में इंसानियत का क़त्ल करना बंद करिए, जिसने तुम्हे बनाया वो खुद की हिफाज़त कर लेगा, हो सके तो थोड़ी इबादत घर के मंदिर और पलग पर लेती माँ के कदमो में दिखा लो, यहाँ से ज्यादा शुकून वहां मिलेगा.

Saturday, 12 August 2017

#shame_on_you_dear_humanity

मेट्रो नहीं चहिये साहब
स्टेडियम भी नहीं चाहिए
रोजगार भी अपने पास रख लो
ये आवास और ये झूठे विश्वास भी रखलो 
मेरा स्कूल का बस्ता और फट्टी किताबे भी ले लो
बस थोड़ी सी सांसे दे दो,
कल से दम घुटा जा रहा हैं
ऐसा लग रहा है, की किसी ने गले के ऊपर लाशो का बोझ रख दिया हो
ऐसा लग रहा है,, की किसी और के हिस्से की सांसे लिए जा रहा हूँ!
इतनी घुटन हो रही है की सांसे ऊपर चढ़ाई ही ना जा रही है,
हाथ कांप कर रहे सोचने में ही की बिना सांसो की ज़िन्दगी कैसे होती है अभी पल भर के लिए बिना सांसे के जीने की सोची, कसम से हो ही नहीं पाया !
फिर
कल उन बच्चों का क्या हुआ होगा?
जब नन्हे-नन्हे पैर उनके पलने में छटपटाये होगे,
कमाल है कुछ सुनाई ही नहीं दिया,
लेकिन सुनाई देगी,
साहब याद रखियेगा ये, हिसाब होगा ,
यहाँ नहीं तो ऊपर होगा, लेकिन इन सांसो का हिसाब तो देना होगा .
और हा साहब राम मंदिर, में भी जाके ये पाप नहीं धुलने वाले...

Tuesday, 25 July 2017

ये रात यूं ही...

ये रात यूं ही ढलते- ढलते ढल जाएगी,
की दिल पत्थर है, फिर भी ओस की तरह बिखर जाएगी।
ये काले बादल यू ही छाते- छाते छा जाएंगे
की बारिश का मौसम है नहीं, बारिश फिर भी आ जाएगी।

           की ईद  को गए हफ्ता- सप्ताह महीना             हो गया है ,
मत निकल घर से, ईद की नमाज़ फिर से हो जाएगी।
खुद को रोक, तुझे भुलाते- भुलाते भूल रहा हूं,
मत लो कोई नाम उसका, एक ही मोहब्बत दो बार हो जाएगी।

और आज मैं यूं ही कहते- कहते केह जाऊंगा,
तूने फिर भी न सुना, तो ये बात बहुत बिगड़ जाएगी।

और फिर मैं यूं ही मरते- मरते मर जाऊंगा,
तूने फिर भी ना पीछे मुड़ के देखा,
तो ये रूह मेरी दो गज के टुकड़े को आसमां में भी तरस जाएगी।

ये रात यूं ही ढलते- ढलते ढल जाएगी,
            की दिल पत्थर है, फिर भी ओस की तरह.                      बिखर.  जाएगी।

कागजी रूह...

सच तो ये है की, जब भी मैं  कुछ लिखने की कोशिश करता हु तो कुछ खास लिख ही नहीं पाता।

लेकिन हां, गर कोई दो घूट गम का पीला दे तो, फिर तुम मेरी कलम की चाल देख लो।

ऐसे सरपट-सरपट दौड़ता है गमों पर, दिल के गुमनाम जख्मों पर की खुद कागज़ बोल देता है की,

भला हो उस मैखाने का जिसने तुझे ये दो घूट गम का पिलाया है।
इसी बहाने तेरी रूह के साथ देख मेरी कागज़ी रूह फड़फड़ा उठी है।

Thursday, 13 July 2017

ये जो बात है...

ये बात ना मीरा की साड़ी की है,
ये बात ना ही हीना के हिजाब के पहरेदारी की है,
और ना ही बात कम कपड़ों के किरदारी की है,

क्युकी ये बात जो है ,
वो है अदब और लिहाज़ की !

जो शुरू आंखो की नीयत और
ख़त्म सोच की रूहानी से है।

Monday, 10 July 2017

ये कहां आ गए हम...

राम मंदिर से शुरू हुई थी
गाय माता पर आकर अटक गई,
भईया काश हमको राजनीति आती होती।

सुलभ शौचालय से शुरु हुई थी
स्वच्छ भारत अभियान पर आकर अटक गई, भईया काश हमको राजनीति आती होती

बेरोजगारी से शुरू हुई थी
डिजिटल इंडिया पर आकर अटक गई,
भईया काश हमको राजनीति आती होती।

मंहगाई से शुरू हुई थी
#GST पर आकर अटक गई,
भईया काश हमको राजनीति आती होती।

गड्ढे मुक्त सरकार से शुरू हुई थी
Make in India पर आकर अटक गई,
भईया काश हमको राजनीति आती होती

चाय की चुस्की से शुरु हुई थी
मन की बात पर आकर अटक गई,
भईया काश हमको राजनीति आती होती।

पाकिस्तान क्रिकेट मैच से शुरू हुई थी
चाइना के माल पर आकर अटक गई,
भईया काश हमको राजनीति आती होती।

और ये सब कुछ एक अच्छे दिन शुरू हुई थी
और आज एक अच्छे दिन पर अटक गई।
भईया की काश सच में हमको राजनीती आती होती।

ये लेख पूरी तरह  से काल्पनिक है, इसका सत्यता
से दूर दूर तक कोई वास्ता नहीं है।

जय श्री राम
आपका आभार।

Wednesday, 5 July 2017

गाय माता...

क्या ऐसे क्या देख रहे हो ? पहले कभी नहीं देखे क्या हमका ? अरे हम गाय तुम्हारी अम्मा हैं। पहचान लो दुई सिंग है हमरे।
इंसान- अम्मा तनिको चिंता ना करो हम रक्षा करेगे तुम्हारी !
गाय - रहने दो , भैया दुई दिन से तुम्हरे दुवारी पर खड़ी है ,एक रोटी तो तुमसे दिया ना गया।
इंसान- अम्मा घर मे कुछ नहीं है खाने को । कहा जाऊं कमाने को ? कोई काम है तो बताइए ?

गाय- क्यू इतना अच्छा काम तो कर रहे ।मेरे लिए घर फूंक रहे । इंसानों को काट रहे? अच्छा खासा कमाते होगे तुम तो ?

इंसान- कुछ नहीं मिलता उससे ?

गाय- तो फिर इतनी मरा मारी क्यों मचा रखी है?

इंसान- ये लीजिए रोटी खाइए आप !

गाय -अरे लानत है ऐसी रोटी पर । भूकी मर जाऊं लेकिन तेरे घर की रोटी ना खाऊ

इंसान -अरे मैं ब्राह्मण हूं !

गाय- रोटी पर लिख के दिखाओ तुम क्या हो?

दो रोटी तुमसे दी ना जा रही कबसे हाय तौबा मचाएं हो। अरे कुछ कम धंधा करो। और तुम लोग अगर इतना उत्पात ना मचाए होते तो घांस फूस खा के इतनी सदियों से जी रहे हैं। तुम्हारे दो रोटी के  लिए तरस नहीं रहे हम ।
घर में पड़ी अम्मा को महीनो से खांसी की दवा ना पीला पा रहे हो चले हो हमको अम्मा बनाने !

नाम बदनाम करके रखे हो हमारा , गाय सुनते ही सब ऐसे भागते है जैसे भूत देख लिए हो। नीक नीक रहो भैया और हमको भी रहने दो। और हा जिसदिन किसी गाय नामक अम्मा को सड़क से उठा कर अपने घर  के आंगन में जगह दे पाना उसदिन लड़ जाना मेरे कटने पर ।

इंसान- अम्मा रोटी अब तो खा लो ।

गाय - भीतर जाओ अपनी  उस अम्मा को आधी रोटी खिलाओ तब हमको आधी दे देना!

और हा तुम कैमरा वाले भगो तो यहां से । दिनभर पकर पकर करते हो।
और खबरदार जो इस सबके लिए भी चर्चा कराए तो ।

गुलाब...

उन्होंने कहा, पूरे अमीनाबाद के लड़के हमपर मरते हैं तुम मानो न मानो वो हमसे बे-पनाह मोहब्ब्त करते हैं और अगर दराख से झुमका भी दिखा दूं तो ...