Monday, 6 May 2019

खर्च हो रहा हूं मैं...



3 बज चुके है, पता है आओगी नहीं
दूर- दूर तक कोई चराग-ए- उम्मीद भी नहीं है

इसलिए आज सोने से पहले, सो जाने पहले, तुमसे फिर से एक बार कह रहा हूं, मुझे संभाल लो।

मैं वक़्त के साथ हर लहर के साथ बहते रेत की तरह थोड़ा- थोड़ा करके खर्च हो रहा हूं।

ऐसा भी कुछ खास नहीं हुआ था उस दिन।

खुद को मनाओगी तो मुझे भी मना लोगी तुम, ये इतने यकीन से मैं नहीं हमारा प्यार कह रहा है।

अभी देरी हुई नहीं है, दूसरी लहर आने से पहले बची रेत को समेटा जा सकता है, एक कोशिश नाकाम ही सही, की जा सकती है।

और अगर देर भी हो गयी इन सब बातों में तो भी क्या फर्क पड़ता है।

कम से कम तुम खुद से कह तो पाओगी, की हां मैने एक कोशिश की थी।

Monday, 1 April 2019

भीड़ से अलग...




तुम भीड़ से अलग हो लिखो किसी तख्ती पर और सामने अपने तख्त के टांग दो दिवार पर कहीं, और देखो उसे सुबह शाम और दिलाओ खुद को यकीन की तुम हो सबसे अलग भीड़ से अलग उन सबसे अलग जो दूसरे के बनाए रास्ते पर चले जा रहे सीना ताने झोला हाथ में झुलाए. तुम साले अपना झोला कंधे पर लिए चलो अपने किनारे, उनसे अलग.

वो खुश दिखे तो चिढ़ाओ उन्हें अपनी भीड़ से अलग वाली तख्ती दिखाकर, और खुद थोड़ी दूर आगे चलकर अपने झोले में हाथ डालकर टटोलना खुद को और देखना कितना कुछ अलग लिए जा रहे हो, कितना कुछ लिये जा रहे हो.

Tuesday, 5 February 2019

वो उसदिन दूसरे झुमके का इंतजाम करके आई थी...




ऐसा कुछ खास नहीं हुआ था उस दिन, वो हमेशा की तरह पूरे एक घंटे की देरी से आई थी. उसदिन भी हमने एक दूसरे को आखरी बार की तरह गले लगाया था.

मेरे लबों से रहा नहीं गया तो हमेशा की तरह मेरे लबों ने उसके लबों को भिगाया था, कुछ खास नहीं कह सकते. उसका शर्माना आज भी पहले जैसा था.

आज भी हमेशा की तरह उसके झुमके दिन में ही चांद को चिढ़ा रहे थे. सूराज से कोई खास लेना देना होता नहीं था उन दिनों. वो अपनी रोशनी के साथ मस्त मगन रहा करता था.

बातें आज भी हमारी उसकी सहेली की बातों से शुरु हुई थी, फिर जब वो सब कह गयी, तब हमेशा की तरह मैने उसे अपने हाफ्ते भर का सरकारी कामकाज गिनाया था, खाने में आज जरुर कुछ फीकापन था, लेकिन इसमें कोई खास बात नहीं, इस मौसम में आलू का स्वाद मीठा ही होता है.

फिर वो शाम ढले घर चली गयी थी, उसके जाने के बाद मैं काफी देर वहीं बैठा रहा, उसके दिए एक झुमके को निहारता रहा और पार्क बंद करवा के घर आ गया था.

और अब मैं हर हफ्ते उसी पार्क में जाता हूं, साथ वो झुमका लिए, मुझे यकिन था, ये झुमका उसका फेवरेट है लेने आएगी, और एक कान अधूरा है उसका तो शयाद इस हफ्ते जल्दी आयेगी.

लेकिन आज इतने सालों बाद जब मैने उसके कानों में दूसरा झुमका देखा तो समझ आया कि, उसदिन
वो बाज़ार से अपने लिए दूसरे झुमके का इंतजाम करके आई थी, और उसदिन वो आलू की सब्जी और पराठे पास के दुकान से लाई थी.

Friday, 25 January 2019

काला चश्मा...

दूसरे देशों के लोग चांद पर बस चुके थे
यहां देश में लोग मंदिर- मस्जिद गाय- बकरी के नाम पर इंसान काट रहे थे.

                                                                          सबको पता था शुरुआत हम करेंगे तो यह रुक सकता है
                                                                          लेकिन सब धर्म नाम का काला चश्मा पहन तमाशा देखते रहे.

देश इस बार अपनो का गुलाम बन गया
सब गूंगे बहरो की तरह खुद पर राज करने लगे.

Thursday, 24 January 2019

गाय हिंदू थी सलीम चाचा मुसलमान...

सलीम चाचा के घर में दो गायें थी
रंग साफ, लीटर भर से ज्यादा दूध देने वाली.


                                                                  पूरे रामपुर में सलीम चाचा की दोनों बेटियों के भी चर्चे थे
                                                                  रंग साफ, किसी के भी दिल को भा जाने वाली.


एक दिन सलीम चाचा की एक गाय घर में मरी पाई गई
लोगों को शक था, गाय हिंदू थी और सलीम चाचा मुसलमान. खैर जान बच गई.
कुछ दिनों बाद सलीम चाचा ने अपनी इकलौती बेटी रेश्मा का निक़ाह कराकर दुनिया को अलविदा कह गए.

Sunday, 30 December 2018

मैं घर वापस आ गया...





                                                                                                                                                              रोज का नाटक हो गया है न टाइम पर नास्ता रेडी होता है न टाइम पर मेरी कॉफ़ी आती है. कबसे कह रहा हूं नयी बाइक ले दो अब ये खटारा नहीं चलाई जाती. और तो और मेरा मुंबई का ट्रिप भी कैंसिल करा दिया पापा ने. 10 हजार ही तो मांगे थे, मेरे सारे दोस्त ट्रिप पर जा रहे बस मुझे छोड़ के.


इस घर में मेरी बात तो कोई समझता ही नहीं. माँ भी पापा के आगे कुछ नहीं बोल पाती मेरी परेशानी, मेरा दर्द तो कोई समझता ही नहीं. कुछ दिनों के लिए कही चला ही जाता हूँ जब नहीं रहूँगा तो सबको मेरी क़द्र होगी.
और मैं अपने इन्ही सब दर्द को लेकर निकल गया घर से, अनजान सी राहों पर चलता गया चलता गया. लोग मिलते गएं.


थोड़ी दूर पर एक घर दिखा, घर के सामने दिखी कुछ लोगों की भीड़. वहां सभी को रोते हुए देखा तो तुरंत समझ आ गया कि कोई आज रुखसत हो गया इस जहां से. यूं तो यहां सबकी आंखों में पानी था, लेकिन आंसू सिर्फ मुझे उस बूढ़ी माँ की आँखों मे दिखा. मुझे फिर मेरा दर्द याद आ गया, मैं बढ़ चला मैं वहां से आगे.


दूर एक खेत में एक नौजवान किसान दिख गया, जो अपने खेत की सौदेबाजी किसी भूमिहार से कर रहा था. दर्द दूर खड़े उसके बूढ़े पिता की आँखों मे था. लेकिन बेटे को बड़े शहर जाने से रोकने के लिए कोई ठोस विश्वास भी नहीं था. इसीलिए बूढ़ा किसान दबे पाँव आया और कांपते हुए अंगूठे से ठाप लगाकर बेटे के पास खड़ा हो गया.
लड़के ने चंद कागज़ के बण्डल लिए और बस पर बैठ दूर बड़े शहर की ओर रवाना हो गया. बूढ़ा बाप टकटकी लगा देखता रह गया. जबतक शहर वाली बस बूढ़ी आँखों से ओझल ना हो गयी. मुझे फिरसे अपना दर्द याद आ गया, और बढ़ चला मैं वहां से आगे.


तभी एक घर से किसी के चीखने चिल्लाने की आवाज़ सुनाई दी पास जाकर देखा तो, एक शराबी अपनी पत्नी से दारू के पैसे मांग रहा था. पैसे ना मिलने पर वो पत्नी को बालों से घसीटता हुआ बहार ले आया और घर से बेदखल कर दिया. घर से दो बच्चे माँ-माँ चिल्लाते हुए सड़क पर माँ के आंसू पोछने आ गए. इन बच्चो की आँखों में अपने माँ के लिए दर्द था. मुझे फिरसे मेरा दर्द याद आ गया, आगे बढ़ चला मैं.


थोड़ी दूर पर सड़क के किनारे दो बच्चे दिख गएं, सूखी जान सी थी दोनों की रूह. कुछ पैसे मांग रहे थे. बोल रहे थे भैया 3 दिन से कुछ नहीं खाया है. कुछ खाने के लिए दे दो. मैंने जेब से 100 का नोट निकाल कर उनको दे दिया जो पिछली सुबह पापा ने जेब खर्च के लिए दिए थे. खैर इनकी आँखों मे अब ख़ुशी थी. लेकिन न जाने क्यों दर्द मेरा अब थोड़ा और बढ़ चला था.अपने थोड़े से पुराने दर्द को इन सबके दर्द के सामने रखके महसूस किया तो मैंने अपने दर्द को बहुत छोटा पाया. ऐसा लगा मानों मैने अभी तक दर्द देखा ही नहीं था. और सब में, मैं कब अपना दर्द भूल गया मुझे पता ही नहीं चला.


मैं थोड़ी देर वहीं रुक अपने दर्द के बारे में सोचने लगा मेरा दर्द कितना कम था. उस माँ से, जिसने अपना जवान बेटा खो दिया था शायद उनके बुढ़ापे का सहारा था वो. उस बूढ़े बाप से, जिसने अपने संतान के हाथों अपनी संतान को बेचते देखा. उन बच्चों से, जो अपने मां के आंसू भी नहीं पोछ सकते हैं. या इन बच्चों से, जो बिना कॉफ़ी के बिना बाइक के बिना किसी चाहत के बस दो रोटी में खुश हो गएं.

शाम हो चली थी, लेकिन आज मुझे भूख नहीं लगी थी. आज बस अपने घर पहुचने की जल्दी थी. मैं अपने कदम तेजी से घर की ओर बढ़ाने लगा. घर आया तो मां ने हमेशा की तरह गुस्से से अपनी फिक्र जाहिर की. और बोलने लगी कहां था सुबह से नालायक? पूरे मुह्हाले में तलाश चुकी तुझे मैं. चल हाथ मुहँ धुल ले मैं खाना गरम कर के लाती हूं. और हां तेरे पापा ने दफ़्तर में एडवांस की बात की है. खाना खाने के बाद बैग पैक करले अपना. वहां ज्यादा उछल-कूद न करना, ध्यान रखना अपना.

और कॉफ़ी के लिए मुहँ न फुला. ले आईं हूं नई कॉफ़ी की डिब्बिया. मैं कुछ बोल नहीं पाया. मैं कुछ जवाब नहीं दे पाया, चुपचाप खाना आने का इंतजार करने लगा. लेकिन आज बहुत शूकुन था मन में. और दर्द की सही पहचान हो गयी थी मुझे, क्यूंकी मैं आज आपना थोड़ा सा दर्द कहीं छोड़ आया था, मानो बरसो बाद आज मैं घर लौट आया था.

Friday, 14 December 2018

उम्र ढलती जा रही...


उम्र ढलती जा रही

रात एक- एक करके कटती जा रही
वादा था तेरा एक रोज लौट आने का

                                                         फिर भी न जाने क्यूं बेचैनी मेरी बढ़ती जा रही
                                                         चलो माना आंखें खुल के भी बंद कुछ देख नहीं पा रही
                                                          लेकिन क्या तुम बेचैन मेरी धड़कन सुन भी नहीं पा रही

क्या इस रात की तरह मैं भी ढल जाउंगा
या तेरे वजूद होने की ख़बर कोई आयेगी

गुलाब...

उन्होंने कहा, पूरे अमीनाबाद के लड़के हमपर मरते हैं तुम मानो न मानो वो हमसे बे-पनाह मोहब्ब्त करते हैं और अगर दराख से झुमका भी दिखा दूं तो ...