मुझे सोशल मीडिया काफी पसंद है, और इसी से मैंने काफी कुछ सीखा भी है. लेकिन पिछले काफी दिनों से मैंने लिखना बंद कर दिया था. और सभी इसका कारण पूछ रहे थे.
लेकिन सच तो ये है की मैं अब भी लिखता हूँ, बस फेसबुक पर लिखना बंद कर दिया है, वो इसलिए क्योंकि यहाँ हर जगह हिन्दू-मुसलमान मंदिर-मस्जिद, पर तर्क चलते है
हमें हर चीज़ फेसबुक पर अपडेट करने की आदत पड़ चुकी है, बगल में खड़ा लड़का अगर किसी लड़की से बदतमीजी कर रहा तो सबसे पहले हम फेसबुक पर लाइव विडियो बनायेगे फिर कुछ बोलेगे,
अगर कोई बच्चा भूख से रो रहा है तो, सबसे पहले उसकी फोटो क्लिक करेगे तब जेब में हाथ डालके सिक्के खंगालेगे,
कुछ बुरा होता हुआ दिखेगा तो अपनी आंखे बंद करके फ़ोन की आंखे खोलेगे.
हर चीज़ बस सोशल करनी है,
भाई पहले सामाजिक बनो तो, समाज के लिए कुछ करो तो सही, ज़मीं पर थोड़ी इन्संनियत दिखाओ तो सही,
अभी हाल ही में गोरखपुर का मामला देखा, फेसबुक पर खूब हाय तौबा मची,फलाना ढमाका, लेकिन क्या हम से किसी ने गोरखपुर जाके उन बच्चो के परिवार से मिलने की कोशिश की?वहा जाके उनका दर्द बाँटना ? चाहा नहीं न ? हम बस दिखावा करते है ,
लाइक,कमेंट,तारीफ ने हमें इतना बांध दिया है की, हमारी भावनाए तक बिकाऊ हो गयी है, जो कुछ लाइक कमेंट में बिक जाते है.
ये जो पोस्ट आप कॉपी पेस्ट करते है, वो महज पोस्ट नहीं है, ये एक आग है, और
ये आग फैलाना बंद करिए, इसकी ताकत का अंदाज़ा आपको अभी नहीं है, एक बार दो बार, लगातार अगर आप कहेगे की वहा वो चल रहा घट रहा तो , वो सच हो न हो. लेकिन कुछ असर जरुर छोड़ जाती है,
और मुझे ये समझ नहीं आता की देश में इतने मुद्दे है इतनी परेशानियाँ है ,फिरभी क्यों लोग धर्म कर्म और आग पर ही क्यों टिके है? सिमटे है
लखनऊ में अगर एकदिन ढंग से बारिश हो जाये तो, पूरे शहर में नाव चलाने जैसा हाल हो जाता है.
शहर के अलग-अलग हिस्सों में आज भी इतनी गंदगी है की बिना मुह पे रुमाल रखे हम वहां से नहीं निकल सकते ,
भाई सलाद में टमाटर नहीं देता ढाबे वाला इतना सस्ता हो चला है टमाटर.
9 बजे ऑफिस के लिए निकलो तब भी बॉस से डांट पड़ ही जाती है.
ट्रैफिक भाईसाब, ट्रैफिक, ऑटो से कूद जाने का मन करता है, इतना गुस्सा आता है कभी-कभी
परेड पर जाने वाली लड़की का बलात्कार हो जाता है , नेता जी फिर से झूठे वादे में फंसा जाते है.
पानी इतना गन्दा है शहर का की ,100 रूपए का पानी खरीद के पीना पड़ता है पूरे दिन.
गाय माता पूरे शहर में पन्नी खाती, धूल फांकती नजर आती है, गौ रक्षको से हाथ जोड़ के विनती है की इनको कोई घर दीजिये, इन्हें मारने वाले कम है, ये खुद ही भूख से दर-दर भटक के मर जाती है,
सिग्नल पर गाड़ियों से ज्यादा हाथ में कटोरे पकड़े बच्चे नजर आते है, दिल रो जाता है, कितनो की भूख मिटाऊ कितनो को भगवन के सहारे छोड़ दूँ.
नौजवान आत्महत्या कर रहा है, नौकरी कहा है? मैट्रिक्स पास मुझे निशांतगंज छोड़ के आ रहा है,मीडिया में पढाई करने वाला मेरे बाल काट रहा है,
काम पर सवाल नही उठा रहा , बस एक सवाल पर सवाल उठा रहा की,क्या मेरा भी यही हाल होगा, ?
चारबाग पर खुला व्यापार नजर आता है, जहा चंद टुकड़ो के लिए, राते बिक जाती है,
ऐसे एक नही,दस हजार मुद्दे, और परेशानियाँ है, जो हिन्दू,मुसलमान,गाय मंदिर-मस्जिद के आगे दिखते ही नहीं.
अरे मत परेशां हो, आज भी गाय माता को पूजा जाता है
मस्जिद में मुसलमान से ज्यादा हिन्दू नजर आता है, गणेश पूजा के लिए चंदा एक मुसलमान भी देता नजर आता है.
मेरे ऑफिस में शबाज़ और विशाल साथ में खाना खाते नजर आते है,
ताईबा दीदी के नमाज़ लिए ऑफिस को ही हम मस्जिद बनाते है,
कही कोई खतरा नहीं हैं भाई,ज़मीनी स्तर पर सबकुछ सही है, ये फेसबुक पर इधर उधर लिखना आग फैलाना बंद करिए, इंसानियत को बस इन्सान से ही खतरा है,
और याकिन मानिये बड़ी फ़िक्र हो रही है,की कुछ दिन और युही चलता रहा तो
जहा से शुरुवात की थी हमने फिरसे वही आके रुक जायेगे,
और सच में तब आप लिख के भी कुछ नहीं कर पायेगे,
धर्म बचाने की कोशिश में इंसानियत का क़त्ल करना बंद करिए, जिसने तुम्हे बनाया वो खुद की हिफाज़त कर लेगा, हो सके तो थोड़ी इबादत घर के मंदिर और पलग पर लेती माँ के कदमो में दिखा लो, यहाँ से ज्यादा शुकून वहां मिलेगा.
