एक अरसे के बाद जब जेब में कुछ नए सिक्के आए, तो सोचा चलो चले मेला घूम के आएं,
लेकिन जब मेले में पहुंचे तो कुछ समझ नहीं पाएं, मुंह से निकला, अरे ये हम कहां चले आएं.
क्योंकि यहां न तो कोई खिलौना था, और न ही कोई बचपन वाला बचपना,
और कोई आस-पास यहां बर्फ का गोला भी है बेचता नहीं दिख रहा, क्या कोई रास्ता तो नहीं भूल आए हम.
वो छोटे-बड़े झूले कहा गए, वो खट्टी मीठी चटनी वाला चाट का ठेला कहां गया,
और कोई क्यों नहीं यहां आस-पास बांसुरी हैं बजा रहा, क्या कहीं खजला वाली दुकान पीछे तो नहीं छोड़ आए.
वो जादूगर कहां गया, उसकी पल में बनती लड़की नागिन कहां गई,
और वो बंदर मदारी कहां गए, क्या सबकुछ छोड़ वो भी किसी दूर नगरी को चले गए.
वो सर्कस वाला तो कलतक यहीं था, उसका जोकर तो कल बाजार में भी मिला था,
और हां, उसके दोनों बब्बर शेर कहां गए, क्या इंसानों को इस जंगल में छोड़ वो भी घर को चले गए.
वो पिज़रे बेचने वाला वो रंग-बिरंगे झंडे बेचने वाला कहा गया,
और वो पतंग माँझे से सजती बच्चों को लुभाने वाली दुकान कहां गई,
और कोई बच्चा क्यो नहीं है आस-पास यहां गुब्बारे के लिये जमीन पर लोट-पोट होता दिख रहा,
क्या हवाओं का रूख बदल सा गया, क्या शहर की उड़ती काली धूल ने गाँव की हवाओं में भी जहर घोल दिया.
वो कठपुतली का खेल कलतक यहीं तो लगा करता था, वो शख्स दो लंबे-लंबे बांशो पर लाठी लिए यहीं रस्सियों पर ही तो चला करता था,
क्या उसके सारे खेल ख़त्म हुए, या हमी मोबाइल गेम के आगे अपना बचपन भूल गए.
वो छोटे-बड़े पर्दे वाले सिनेमाघर कहां गया, वो सुबह से बिकती उसकी सुबह से बिकती 10,10 शो की टिकटे कहां गयी,
और कोई क्यों नहीं हैं मेरा हाथ पकड़ के मुझे रामलीला दिखा रहा, क्या इस छोटे से मोबाइल स्क्रीन पर सारे रंगमंच सिमट के है रह गए.
वो बाबा जी की कुटिया तो कलतक यहीं थी, हाथों में चंदन लिए, माला लिए कलतक यहीं तो बैठा करते थे,
क्योंकि पिछली बार मैंने उनको अपना हाथ दिखाया था, मेरा आने वाला कल बहुत अच्छा होगा, उन्होंने ऐसा मुझे यकीन दिलाया था,
क्या वो भी अपने भाग्य से हार गए, क्या पिछले मेले के दंगों में वो भी अपनों के हाथों मारे गए.
वो बिंदी, चूड़ी, गाजरों की दूकान वो रंग बिरंगे दुप्पटे बेचने वाला कहां गया,
और कोई क्यों नहीं बच्ची यहां आस-पास गुड्डे-गुड़िये के लिए रोती दिख रही,
क्या कोई बच्ची अब जन्म लेती ही नहीं, या लेती है तो बड़ी होती नहीं.
और यहां पसरा इतना सन्नाटा क्यूं है?
ऐसे कई सवाल लिए मैं उस दिन मेले में घंटों भटकता रहा, फिर पास वाली जिंदगी की दुकान से थोड़े नए सपने, थोड़ी नई चाहते, कुछ और हसरतें खरीद कर घर वापस आ गया, हां, घर आकर थोड़ी हैरानी तो थी. लेकिन कर भी क्या सकते थे, इतने दिन से एक बेहतर जिंदगी जीने की परेशानी भी तो थी.
या शायद- या शायद, बाबा के मेले की बच्ची बस इतनी सी ही कहानी थी.

