Wednesday, 25 October 2017

बाबा का मेला...



एक अरसे के बाद जब जेब में कुछ नए सिक्के आए, तो सोचा चलो चले मेला घूम के आएं,

लेकिन जब मेले में पहुंचे तो कुछ समझ नहीं पाएं, मुंह से निकला, अरे ये हम कहां चले आएं.



क्योंकि यहां न तो कोई खिलौना था, और न ही कोई बचपन वाला बचपना,

और कोई आस-पास यहां बर्फ का गोला भी है बेचता नहीं दिख रहा, क्या कोई रास्ता तो नहीं भूल आए हम.



वो छोटे-बड़े झूले कहा गए, वो खट्टी मीठी चटनी वाला चाट का ठेला कहां गया,

और कोई क्यों नहीं यहां आस-पास बांसुरी हैं बजा रहा, क्या कहीं खजला वाली दुकान पीछे तो नहीं छोड़ आए.



वो जादूगर कहां गया, उसकी पल में बनती लड़की नागिन कहां गई,

और वो बंदर मदारी कहां गए, क्या सबकुछ छोड़ वो भी किसी दूर नगरी को चले गए.



वो सर्कस वाला तो कलतक यहीं था, उसका जोकर तो कल बाजार में भी मिला था,

और हां, उसके दोनों बब्बर शेर कहां गए, क्या इंसानों को इस जंगल में छोड़ वो भी घर को चले गए.



वो पिज़रे बेचने वाला वो रंग-बिरंगे झंडे बेचने वाला कहा गया,

और वो पतंग माँझे से सजती बच्चों को लुभाने वाली दुकान कहां गई,

और कोई बच्चा क्यो नहीं है आस-पास यहां गुब्बारे के लिये जमीन पर लोट-पोट होता दिख रहा,

क्या हवाओं का रूख बदल सा गया, क्या शहर की उड़ती काली धूल ने गाँव की हवाओं में भी जहर घोल दिया.



वो कठपुतली का खेल कलतक यहीं तो लगा करता था, वो शख्स दो लंबे-लंबे बांशो पर लाठी लिए यहीं रस्सियों पर ही तो चला करता था,

क्या उसके सारे खेल ख़त्म हुए, या हमी मोबाइल गेम के आगे अपना बचपन भूल गए.



वो छोटे-बड़े पर्दे वाले सिनेमाघर कहां गया, वो सुबह से बिकती उसकी सुबह से बिकती 10,10 शो की टिकटे कहां गयी,

और कोई क्यों नहीं हैं मेरा हाथ पकड़ के मुझे रामलीला दिखा रहा, क्या इस छोटे से मोबाइल स्क्रीन पर सारे रंगमंच सिमट के है रह गए.



वो बाबा जी की कुटिया तो कलतक यहीं थी, हाथों में चंदन लिए, माला लिए कलतक यहीं तो बैठा करते थे, 
क्योंकि पिछली बार मैंने उनको अपना हाथ दिखाया था, मेरा आने वाला कल बहुत अच्छा होगा, उन्होंने ऐसा मुझे यकीन दिलाया था, 
क्या वो भी अपने भाग्य से हार गए, क्या पिछले मेले के दंगों में वो भी अपनों के हाथों मारे गए.



वो बिंदी, चूड़ी, गाजरों की दूकान वो रंग बिरंगे दुप्पटे बेचने वाला कहां गया, 
और कोई क्यों नहीं बच्ची यहां आस-पास गुड्डे-गुड़िये के लिए रोती दिख रही,  
क्या कोई बच्ची अब जन्म लेती ही नहीं, या लेती है तो बड़ी होती नहीं.



और यहां पसरा इतना सन्नाटा क्यूं है?



ऐसे कई सवाल लिए मैं उस दिन मेले में घंटों भटकता रहा, फिर पास वाली जिंदगी की दुकान से थोड़े नए सपने, थोड़ी नई चाहते, कुछ और हसरतें खरीद कर घर वापस आ गया, हां, घर आकर थोड़ी हैरानी तो थी. लेकिन कर भी क्या सकते थे, इतने दिन से एक बेहतर जिंदगी जीने की परेशानी भी तो थी.

या शायद- या शायद, बाबा के मेले की बच्ची बस इतनी सी ही कहानी थी.

Tuesday, 10 October 2017

आलू खट्टे है...




मैं शायरी लिखता हूं और हल्के फुल्के मजाक भी करता हूं, और इन सबके आलावा सच लिखने की भी कोशिश करता हूं। लेकिन आजकल राजनीतिक मुद्दों पर लिखने से थोड़ा बचता हूं। वो इसलिए, क्योंकि मुझे इनबॉक्स में या मेरे पोस्ट पर मां बहन की गली खाना नहीं पसंद, ना ही मेरे पिताजी के पास 10000000 रुपए है जो दे से सके। मैंने तो शून्य भी उंगली पर गिनकर लिखा है। सोचो देना पड़ता तो क्या होता। करेजा ही फट जाता शायद।


ऐसा पहले था या नहीं था, या था तो मैंने गहन चिंतन नहीं किया था। पता नहीं। लेकिन आजकल मैने ये मेहसूस किया है की सरकार के खिलाफ बोलना कितना मुश्किल हो गया है। अब तो होली से पहले गोली मार दी जाती है। और दीवाली से पहले फोड़ दिया जाता है। आज कल कुछ भी बोलने पर राष्ट्रविरोधी घोषित कर दिया जाता है।


अरे 99 कलम तो बिक ही चुकी है, किसी एक तो लिखने दो बोलने दो। या नहीं पसंद तो सारे अख़बार सारे चैनल सारे वेब पोर्टल जो 1 की गिनती में आते है उनको बंद करा दो। हां क्योंकि जब सवाल ही सुनने नहीं पसंद तो जो आप बोले वही सही, आलू खट्टा होता है वो भी सही, या तो फिर कोई कह रहा की आलू काना है तो चेक करिए। वरना मूर्ख जनता तो काने आलू की सब्जी 5 साल खाएगी ही।



सच पूछो तो हॉस्टल के मेस जैसा हाल हो गया है सरकार का, जो कहे वही सही जो बनाए वही ताजा फिर भले ही क्यों ना खाना दो चार दिन का बासी ही हो। देशभक्ति की नाम पर मन मानी करना बंद करिए, क्यूंकी जब देश ही बिक जाएगा तो देशभक्ति किस काम की रहेगी। 


मैं सवाल छोड़ के यहीं जा रहा क्यूंकी मुझे है कायदे की सर्दी भईया, और हां खिड़की मेरी कांच की नहीं है इसलिए पत्थर मार के देख सकते है। लेकिन सवाल मेरा वही है, की जब आलू में छेद नहीं है तो खुलकर पूरी सब्जी की रेसिपी बताइए। या फिर बोल दीजिए मेस वाले पांडे की तरह जैसी भी है यही खानी है अब।

गुलाब...

उन्होंने कहा, पूरे अमीनाबाद के लड़के हमपर मरते हैं तुम मानो न मानो वो हमसे बे-पनाह मोहब्ब्त करते हैं और अगर दराख से झुमका भी दिखा दूं तो ...