Tuesday, 10 October 2017

आलू खट्टे है...




मैं शायरी लिखता हूं और हल्के फुल्के मजाक भी करता हूं, और इन सबके आलावा सच लिखने की भी कोशिश करता हूं। लेकिन आजकल राजनीतिक मुद्दों पर लिखने से थोड़ा बचता हूं। वो इसलिए, क्योंकि मुझे इनबॉक्स में या मेरे पोस्ट पर मां बहन की गली खाना नहीं पसंद, ना ही मेरे पिताजी के पास 10000000 रुपए है जो दे से सके। मैंने तो शून्य भी उंगली पर गिनकर लिखा है। सोचो देना पड़ता तो क्या होता। करेजा ही फट जाता शायद।


ऐसा पहले था या नहीं था, या था तो मैंने गहन चिंतन नहीं किया था। पता नहीं। लेकिन आजकल मैने ये मेहसूस किया है की सरकार के खिलाफ बोलना कितना मुश्किल हो गया है। अब तो होली से पहले गोली मार दी जाती है। और दीवाली से पहले फोड़ दिया जाता है। आज कल कुछ भी बोलने पर राष्ट्रविरोधी घोषित कर दिया जाता है।


अरे 99 कलम तो बिक ही चुकी है, किसी एक तो लिखने दो बोलने दो। या नहीं पसंद तो सारे अख़बार सारे चैनल सारे वेब पोर्टल जो 1 की गिनती में आते है उनको बंद करा दो। हां क्योंकि जब सवाल ही सुनने नहीं पसंद तो जो आप बोले वही सही, आलू खट्टा होता है वो भी सही, या तो फिर कोई कह रहा की आलू काना है तो चेक करिए। वरना मूर्ख जनता तो काने आलू की सब्जी 5 साल खाएगी ही।



सच पूछो तो हॉस्टल के मेस जैसा हाल हो गया है सरकार का, जो कहे वही सही जो बनाए वही ताजा फिर भले ही क्यों ना खाना दो चार दिन का बासी ही हो। देशभक्ति की नाम पर मन मानी करना बंद करिए, क्यूंकी जब देश ही बिक जाएगा तो देशभक्ति किस काम की रहेगी। 


मैं सवाल छोड़ के यहीं जा रहा क्यूंकी मुझे है कायदे की सर्दी भईया, और हां खिड़की मेरी कांच की नहीं है इसलिए पत्थर मार के देख सकते है। लेकिन सवाल मेरा वही है, की जब आलू में छेद नहीं है तो खुलकर पूरी सब्जी की रेसिपी बताइए। या फिर बोल दीजिए मेस वाले पांडे की तरह जैसी भी है यही खानी है अब।

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