Thursday, 1 February 2018

मौत का सामान बनाते रहो...


मेरे मन को एक सवाल कई दिनो से कचोट रहा था, जिसका जवाब मैंने कई बार खुद को देना चाहा लेकिन न मन शांत हुआ और न ही कोई मेरी उलझन का जवाब मिला। लेकिन मेरी उल्झन आज तब और बढ़ गयी जब आज मैंने 2019 बजट में रक्षा बजट की राशि 3 लाख करोड़ सुनी। हर की तरह इस साल भी यह राशि कई कई गुना बढ़ी है।


लेकिन सोचने वाली बात ये है की हमने इतने पैसे सिर्फ़ खुद को खुद से बचाने के लिए तय किया हैं। क्योंकि खतरा जिनसे है वो हम इंसान ही है। और ये सिर्फ़ हमारे देश का हाल नहीं है। दुनिया भर में हर साल लाखों अरबों, करोड़ों रुपये सिर्फ़ इसलिए ही खर्च होता हैं कि हम और नए हथियार बना सके, कुछ और नयी मिसाइले बना सके और तमाम ऐसी चीजें बना सके जिनसे हम एक दूसरे को मार सके।


मैं न भ्रष्टाचार की बात करने वाला हूँ, न रोजगार की और न ही किसी विकास योजना की, क्योंकि ये सुबह-शाम की भूख नहीं मिटा सकते। इसलिए मैं सिर्फ बात भूख की करना चहता हूँ। एक आम इंसान की खाने की थाली 30 रुपए की आती हैं. इस थाली में एक किस्म की सब्ज़ी, थोड़ा दाल ,थोड़ा चावल और एक टुकड़ा अचार का होता। और ये सब न मिले तो दो रोटी से भी काम चल जाता हैं। और दो रोटी की कीमत जैसा आपको मुनासिब लगे आप तय कर लीजिए। लेकिन जब यही 30 वाली थाली किसी गरीब के पहुंच से दूर जाता दिखाई देता हैं तो हर सरकर के करोड़ो वाले वादे चुभने लगते है, और बड़ा ठगा-ठगा सा महसूस होता हैं।


लगभग आधे से ज्यादा देश में यही हाल हैं, की उसे अपने पड़ोसी देश से पहले चाँद तक पहुंचना हैं, उससे ज्यादा तकातवर बनना हैं साथ ही अपने देश को खूब चमकाना हैं। भले क्यों न उसके देश की आधी अबादी को रात को भूखा सोए। समझ ही नहीं आता इसे मनाव की तरक्की समझा जाये या उसकी जाहीलियत।


मेरे पास न ढेर सारे रिसर्च हैं न ही ढेर सारे रिकार्ड, की हर दिन भूख से कितने मरते हैं, और कितने घरों में मौत बिन बुलाए आ जाती हैं। और मैं कोई तथ्य ढूँढने जाऊं ही क्यों जब भूख से मौतें मेरे मोहल्लें में भी होती हैं, गिनती का क्या हैं ये ऊपर नीचे होती रहेंगी। लेकिन एक चीज और होगी, जो बहुत ही खतरनाक होगी। आने वाले वक़्त में हर देश के पास ढेर सारी मिसाइले तो होगी, ढेर सारे हथियार भी होंगे, चाँद पर भी सबका राज भी हो ही जायेगा, बटंवारे में ही सही लेकिन सबके हिस्से में थोड़ा-थोड़ा आ जरुर जाएगा।


लेकिन अगर किसी के पास कुछ नहीं होगा, तो वह होगी 'रोटी'। क्योंकि हम सारे इंतज़ाम तो बस हथियारों का कर रहे तो वाजीब है रोटी आयेगी कहां से आएगी? हां लेकिन ये मिसाइल, और हथियार जाया भी नहीं जायेगी, क्योंकि असली जंग तो आने वाले वक़्त में रोटी के लिए ही होगी। इसलिए बनाते रहिए मौत का समान, जब तक आधी रोटी बची है।

4 comments:

  1. क्या करेंगे भाई हम लोग मानवता की स्थापना कर ही नहीं पाया या यूं कहें कि हम लोग मानवता की स्थापना करने में असफल रहे यह जो शस्त्रीकरण की दौड़ है निश्चित रूप से मानवता के लिए खतरा है लेकिन उसी संदर्भ में यदि हम दूसरा पहलू देखें तो मानवता को बचाने का भी एक यंत्र है अब कौन सही है कौन गलत यह तय कर पाना बड़ा मुश्किल हो जाता है बहरहाल आपने बहुत ही अच्छा लिखा है

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