Saturday, 9 June 2018

रात हसीं वो बीत गई...



रात हसीं वो बीत गई, ये दिन काला लौट आया है,

खून चूसने अश्क़ बहाने ये दिन साला लौट आया है.


अब सारा दिन खुद से खुद की जंग चलेगी

कभी ये मुझसे लड़ेगा, कभी मैं इससे हार जाउंगा,

फिर शाम ढलते- ढलते ये दिन भी निकल जाएगा.



लेकिन शुक्र है,

सबके हिस्से की तरह, मेरे हिस्से में भी एक रात आएगी,

हां, दिन अधूरा रहा है आज का लाजामी है

शूकून की नींद नहीं आयेगी. फिर बीती कल की रात की तरह

ये रात भी बस काली होकर गुजर जायेगी.



रात के साये में

चमकते हर छोटे- बड़े तारे में

जिंदगी की चमक तो दिखेगी

फिर दिन के निकलते सूरज में

उसकी तपन में, ज़िंदगी के ख्वाब सारे जलते भी नजर आयेंगे.



शाम की ढलती सूरज की किरणों में

ज़िंदगी थोड़ी लाल थोड़ी मटमैली हो जायेगी,

फिर हर शाम की तरह ये रात भी ज़िंदगी की तरह

बस काली होकर गुजर जाएगी.

Thursday, 7 June 2018

मैं, मैं कहूं तुम, तुम समझ लेना...




मैं इश्क़ कहूं, तुम इंतजार समझ लेना।

मैं रब कहूं, तुम खुद को आइना समझ लेना।

मैं गीत कहूं, तुम गुलज़ार समझ लेना।

मैं धूप कड़कती धूप का शुकून कहूं, तुम अपनी जुल्फों की छाव समझ लेना।



मैं अब बस कहूं, तुम थोड़ा और समझ लेना।

मैं जब कुछ न कहूं, तब तुम सबकुछ समझ लेना।

मैं ताज कहूं, तुम मुमताज समझ लेना।

मैं बरसों की प्यास कहूं, तुम हीर से रांझे की मुलाकात समझ लेना।



मैं अमावास की काली रात कहूं, तुम चांद कर रहा थोड़ा और श्रृंगार समझ लेना।

मैं गर जो खूबसूरत चांद में दाग कहूं, तुम अपने गले का वो काला छोटा तिल समझ लेना।



मैं कोई छोटी सी छोटी बात कहूं, तुम ढेर सारे चिठ्ठी-तार समझ लेना।

मैं गर चिट्ठी कुछ भी न कहूं, तुम तब भी उसे मेरे प्रेम का सार समझ लेना।



मैं बरसो बाद आज उनका हुआ दीदार कहूं, तुम उस दिन छत पर निकलेगा ईद का चांद समझ लेना।

मैं गर जो ये सर हर चौखट पर झुका कहूं, तुम अपने सदके में अदा हुई मेरी हर नमाज़ समझ लेना।


मैं रातों का ख्वाब कहूं, तुम आंखो से मेरी बरसात समझ लेना।

मैं गर जो बरसात कहूं, तुम आंखों से बहती तेरी- मेरी हर याद समझ लेना।


मैं, मैं कहूं तुम, तुम

समझ लेना।

मैं, मैं कहूं तुम, तुम

समझ लेना।

गुलाब...

उन्होंने कहा, पूरे अमीनाबाद के लड़के हमपर मरते हैं तुम मानो न मानो वो हमसे बे-पनाह मोहब्ब्त करते हैं और अगर दराख से झुमका भी दिखा दूं तो ...