Friday, 17 May 2019
Monday, 6 May 2019
खर्च हो रहा हूं मैं...
3 बज चुके है, पता है आओगी नहीं
दूर- दूर तक कोई चराग-ए- उम्मीद भी नहीं है
इसलिए आज सोने से पहले, सो जाने पहले, तुमसे फिर से एक बार कह रहा हूं, मुझे संभाल लो।
मैं वक़्त के साथ हर लहर के साथ बहते रेत की तरह थोड़ा- थोड़ा करके खर्च हो रहा हूं।
ऐसा भी कुछ खास नहीं हुआ था उस दिन।
खुद को मनाओगी तो मुझे भी मना लोगी तुम, ये इतने यकीन से मैं नहीं हमारा प्यार कह रहा है।
अभी देरी हुई नहीं है, दूसरी लहर आने से पहले बची रेत को समेटा जा सकता है, एक कोशिश नाकाम ही सही, की जा सकती है।
और अगर देर भी हो गयी इन सब बातों में तो भी क्या फर्क पड़ता है।
कम से कम तुम खुद से कह तो पाओगी, की हां मैने एक कोशिश की थी।
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