Monday, 20 August 2018

सफ़ेद कपड़े...



आसमान काला मैला था
एक शख़्स बड़ी उलझन में बैठा था

उसके सारे कपड़े मैले थे
थोड़े सफ़ेद थोड़े रंगीन जैसे थे

उसकी नजरें इधर- उधर खुद को ढूढ़ रही थी

ऊपर से भी उसे कोई देख रहा था
मानो पूरा जहां उसे घूर रहा था

वो कपड़े उतार वहां से भागना चाहता था

लेकिन तभी अचानक से बूँदा- बान्दी शुरू हो गई
वो शख़्स वहीं पर बैठा रहा, उसके सारे कपड़े सफ़ेद हो गए

वो फ़िर से भागना चाहता था
लेकिन तभी जोरो की आंधी चलने लगी

वो शख़्स वहीं बैठा रहा
और कुछ देर बाद आसमान छ्ट के सफ़ेद हो गए

लेकिन उस शख़्स के कपड़े फ़िर से मैले हो गए

Monday, 13 August 2018

याद नहीं करते...


याद नहीं करते

मुलाकात नहीं करते

किसी से बात नहीं करते

किसी से कोई फ़रियाद भी नहीं करते

और ये तब तक चलता रहा जब तक ''उसने'' याद नहीं किया.

अब याद भी करते हैं

सबसे मुलाकात भी करते हैं

जो मिले उससे खूब बात भी करते हैं

और हर दिन खुदा से फ़रियाद भी करते हैं

और ये तब तक चलता रहा जब तक "उसने" याद नहीं कर लिया!

Monday, 6 August 2018

मैं हिंदुस्तान हूं...



ना हरा ना भगवा
ना चोला लाल लिए चलता हूँ,
मैं हिंदुस्तान हूँ।
सर पे तिरंगे का शान लिए चलता हूँ।

ना गीता ना क़ुरान
ना बाइबिल का पाठ लिए चलता हूँ,
मैं हिंदुस्तान हूँ!
अपने दोनों कंधो पर ईमान लिए चलता हूँ।

ना अज़ान ना गुड़गांन
ना ही घंटो की ताल पर चाल चला करता हूँ,
मैं हिंदुस्तान हूँ!
हर दिन जुबां पर देश का राष्ट्रगान लिए चलता हूँ।

ना ईद ना दीवाली
ना गुरु पर्व की याद लिए चलता हूँ,
मैं हिंदुस्तान हूँ!
चारों दिशाओ में अपने तिन रंगों की बहार लिए चलता हूँ।

ना दिल्ली ना गुजरात
ना कश्मीर की बात किया करता हूँ,
मैं हिंदुस्तान हूँ!
जर्रे-जर्रे कतरे-कतरे में हिमालय का ताज लिए चलता हूँ।

ना गोला ना बारूद
ना तोपों की चाल लिए चलता हूँ,
मैं हिंदुस्तान हूँ,
अपने हर पल में अमन और शांति का मशाल लिए चलता हूँ।

मुझे हर रंग बे-रंग सा लगता है...



मुझे हर रंग बे-रंग सा लगता है
                                                            मुझे ये कोरा दिन भी सपना सा लगता है.

मुझे सारे हरे पत्ते सूखे से लगते हैं
मुझे हर सूखे पत्ते बिखरे से लगते हैं.

                                                            मुझे दरिया का पानी कम सा लगता है
                                                            मुझे दो बूंदों से भरा प्याला भी डूबने के काबिल सा लगता है.

                                                             
मुझे हर रंग बे- रंग सा लगता है!

Thursday, 2 August 2018

रेत का घर...



पहले मैं रेत को समेटना चाहता था
क्यूंकी मुझे ऐसा लगता था की रेत पर चलना बहुत ही आसान है, 
लेकिन मेरी यह गलतफ़हमी दो कदम चलने के बाद दूर हो गई.


                                                फ़िर मैं दरिया में तैरना चाहता था
                                                क्यूंकी मुझे मुझे ऐसा लगता था की दरिया में तैरना कोई मुश्किल काम नहीं, 
                                                लेकिन मेरी यह गलतफ़हमी भी दो लहरों के बाद दूर हो गई.


फ़िर एक दिन मैने कुछ नहीं किया
दरिया को रेत से और रेत को दरिया से मिल जाने दिया.
और आज मेरा रेत का एक घर है,
और ठीक मेरे घर के बगल से ही एक दरिया बहती है.

गुलाब...

उन्होंने कहा, पूरे अमीनाबाद के लड़के हमपर मरते हैं तुम मानो न मानो वो हमसे बे-पनाह मोहब्ब्त करते हैं और अगर दराख से झुमका भी दिखा दूं तो ...