इमारत में पांचवी मन्जिल पर एक एक पुस्तकालय है, पुराने पुस्तकालय की बात करे तो शहर में यह इकलौता पुस्तकालय बचा था।
बाकी इमारत की सभी मंजिलो पर सरकारी दफ्तरों का जमवाड़ा है,शाम के 4 बजे होगे शायद, मैं पुस्तकालय में अपनी टेबल पर बैठा अपनी पसंदीदा पुस्तक पढ़ रहा था । पुस्तकालय में कर्मचारी में एक ही सज्जन थे जिनकी आंखे लगभग ओझल सी हो चली थी, फिरभी सभी किताबो को एक सरसरी निगाह में देख के बता देते थे , की वो पुस्तक वहा रखी है। ये उनका प्रेम था शायद पुस्तकों के प्रति जो बूढ़ी आँखों से भी ओझल ना होती थी।
उनका नाम शिव मोहन था और काफी चिड़चिड़े स्वभाव के हो गए थे,लाज़मी था क्युकी सभी आने वाले लोग पुस्तक पढ़ने के बाद इधर-उधर रख के चले जाते थे ,इसलिए शिव मोहन जी को वो सभी पुस्तके रखने में बड़ी कठनाई होती थी।
और मुझे यहाँ रोज आना होता है इसीलिए मैं पुस्तक पढ़ने के बाद जहा से लाता वही रख के आता ,क्युकी मुझे शिव मोहन जी के गुस्से का शिकार नहीं होना था, मेरे टेबल के बगल में एक पुराने किताबों की इमारत थी काफी पुरानी और फटे किताबों का ढेर था वो,जिसे पढ़े जिसे छुए ना जाने कितनी सदी बीत गयी हो। मैंने कई बार उन्हें पढ़ने की रूचि दिखाई लेकिन उसपर शिव मोहन की आँखों की सहमती ना बनी तो मैंने उसे कभी छुवा नही, और पुस्तकालय में कई अन्य रोचक पुस्ताके रखी थी इसलिए मैंने शिव मोहन जी की आँखों से बैर ना करना ही ठीक समझा। मैं अपनी पुस्तक के अगले पन्ने पर जाने ही वाला था की,मेरी नजर एक नौजवान पर पढ़ी, जींस,टीशर्ट हाथ में चमचमाती घड़ी,और फ़ोन पर कुछ देखते हुए उसका आगमन पुस्तकालय की और तेजी से हुआ। अमुमन आज की युवा पीढ़ी में पुस्तकालय मैं आना जाना कम ही होता था इसलिए मैंने ज्यदा ध्यान न दिया उसके बाद ,मैं फिरसे अपने पुस्तक को सरसरी निगाह से पढ़ने लगा , लेकिन आगले पन्ने पर जैसे ही मैं जाने वाला था मेरी नजर ऊपर उठी तो देखा पूरा पुस्तकालय मेरे एक पन्ने के अंत तक उथल-पुथल हो चुका था, और वो नौजवान अभी भी बड़ी बेसाब्री से किताबे इधर उधर किये जा रहा था, शिव मोहन जी के कछुवे जैसे कदम तेजी से खरगोश के भाति उसकी और बढ़ी और , कुछ ही लम्हों में शिव मोहन जी ने उसकी लावे जैसे चाह को ठंडे पानी की तरह शांत कर दिया, और साफ साफ लफ्जों में कहा चुपचाप बैठ जाओ वरना पुस्तकालय से निकाल दिए जाओगे। युवक झुकी नजरों से थोड़ा और उथल-पुथल करने की इजाज़त चाहता था, मगर शिव मोहन जी की इंकार भरी आँखों को देख कर उसकी चाहत का अंत हुआ और वो थक हार कर मेरी टेबल के किनारे बैठ गया। लेकिन उस युवक की आंखे अभी भी पुस्तकालय की सभी पुस्तकों पर थी, मैंने उसकी आंखे देखी तो पता चला वो अपनी आँखों से मानो पुस्तकालय की लाखों किताबे चंद लम्हों में पढ़ लेनी चाहती हो, इतनी ललक और इतनी किताबो के प्रति चमक थी उनमे।
मैं अपनी पुस्तक बंद करके रखने के लिए उठ ही रहा था कि, आखिरकार उस युवक का मुख से पहला शब्द निकला जो मेरे लिए था उसका सवाल था वो। की आपने यहाँ 'हिन्द राजकुमार' नमाक कोई पुस्तक देखी है क्या?
मैंने ऐसी कोई पुस्तक अभी तक पढ़ी नहीं थी , ना ही देखी थी इसलिए मेरा उत्तर ना था ।मैंने अपनी पुस्तक उठाई और उसे वही रखा जहा से उठाया था, लेकिन उसके बावजूद शिव मोहन जी की आंखे लाल थी, इसका श्रेय उस युवक को जाता है जिसने यहाँ पर इतनी उथल-पुथल मचाई थी. मैंने हलकी सी मुस्कान में शिव मोहन की आँखों को जवाब दिया , की मैंने कुछ नहीं किया जी । मैं वापस अपनी टेबल पर आया अपना चस्मा उठाने ,लेकिन उस युवक का उतरा हुआ चैहरा देखकर मुझसे बिना यह पूछे रहा न गया की , क्यों वो उस पुस्तक के लिए इतना परेशान है।
तब उस युवक ने बताया की मेरे पापा एक लेखक थे, जिन्होंने एक किताब लिखी थी जिसका नाम 'हिन्द राजकुमार था। माँ ने मुझे बताया की उनको पुस्तकों से बड़ा लगाव था, माँ हमेसा कहती है की उनकी सौतन पापा की किताबे थी,और कई बार उनका पापा से झगड़ा भी इसी वजह से हुआ। मैंने अपना पापा को कभी नहीं देखा,वो कैसे दिखते थे, कैसे बोलते थे, कैसे चलते थे!जब गुस्सा होते थे तो वो भी क्या सबके पापा की तरह डांटते थे।
और उनके प्यार करने का अंदाज़ कैसा था। इन सभी चीजों से मैं अंजान हू। मेरी माँ ने बताया की जब मैं उनकी कोख में था तब ही उनको भगवान जी ने अपने पास बुला लिया था। लेकिन माँ ने बताया की जब मैं पैदा होने वाला था तो वो मेरे नाम के लिए एक किताब लिख रहे थे,और जाने से पहले उन्होंने वो किताब किसी पुस्तकालय में रख दी थी। मुझे बस एकबार उस किताब को छूना है। अपने पापा को छूना है।
उस युवक की बाते सीधे दिल पर लग रही थी, और बातो बातो में कब मेरी आंखे नम हो गयी पता ही नहीं चला।
शिव मोहन जी काफी समय से पुस्तकालय में थे , और सभी पुरानी किताबो का ब्यौरा भी था उनके पास,और दूर से ही वो उस युवक की सभी बाते सुन रहे थे । मैंने उनसे नजरे मिलायी और आँखों ही आँखों में प्रश्न किया। लेकिन उत्तर आंख के दूसरी ओर हों जाने पर उनकी । मैं उस युवक से फिर से बात करने लगा । मैंने पूछा , तुम्हारे पिता जी ने पुस्तक कब लिखी थी ?
युवक ने बताया , मुझे मेरी माँ ने कभी इसके बारे में ज्यदा बताया नही,बस उन्होंने ये बताया है की उस पुस्तक का नाम हिन्द राजकुमार है , और वो उनकी लिखी पहली और आखरी पुस्तक थी वो। मैंने शहर के लगभग हर पुस्तकालय और रद्दी खानों में उस पुस्तक की तलाश की है । लेकिन अभी तक वो नहीं मिली।और ये शहर का आखरी पुस्तकलय है । और अगर यहाँ भी वो पुस्तक नही मिली तो ,मैं अपने पिता की लिखी किताब कभी नही पढ़ पाउँगा ।
इतना कहते ही वो युवक की आँख दबी जुबान में रोने लगी। मैंने उसे पास रखे बोतल से पानी दिया और चुप कराने की कोशिस की , थोड़ी देर में वो शांत हुआ , तभी शिव मोहन जी आये और उस युवक का हाथ पकड़ के उठाने लगे ,मुझे लगा वो उस युवक को पुस्तकालय से बहार निकाल रहे है । लेकिन वो उसे लेकर मेरे टेबल के पीछे आ गये । और उधर रखी उन पुरानी
किताबो की ओर इशारा किया । मैंने भी अपनी कुर्सी पीछे घुमा ली,उस युवक ने शिव मोहन को देखा और शिव मोहन ने किताबो की ढेर की ओर इशारा फिरसे किया , और उस युवक ने बिना किसी पल गवाए उन सभी पुरानी किताबो में अपनी पिता की किताब ढूढ़ने लगा,
मैंने भी उसके काम मे हाथ बटाने की रूचि दिखाई परन्तु मुझे शिव मोहन जी ने रोक दिया । लेकिन उधर उस युवक ने देखते ही देखते सारी पुरानी किताबो की इमारतो को छोटे छोटे घरो में तब्दील कर दिया था। और ये आखरी इमारत बची थी ,और मैं मन ही मन ईश्वर से प्राथना कर रहा था की वो पुस्तक उसको मिल जाये । अचानक से इस युवक ने मुझे जोर से गले लगा लिया और रोने लगा फिरसे , मैंने बड़े स्नेह से उसे हटाया,तो देखा उसके हाथ में एक चमकती किताब थी जिसका नाम हिन्द राजकुमार था, उस पुस्तक को देख के ऐसा लग रहा था मानो किसी जलती आग की ढेर से कोई चमकता सोना बहार निकला हो ।और वो उस पुस्तक को सीने लगाये रोये जा रहा था। वो किताब के हर पन्नो को ऐसे छु रहा था मानो वो अपने पिता को उसमें महसूस कर रहा हो । वो हर अगले पन्ने पर ऐसे जा रहा था जैसे उसके पिता उसको चलना सिखा रहे हो । एक एक लिखे शब्द में वो अपने पिता की सीख ढूढ़ रहा था, और उसे मानो दुनिया का सबसे बड़ा खजाना मिल गया था। वो उस किताब में इतना खोया था की उसे पता भी नही था की आस पास कोई है भी।
दूर से शिव मोहन से जी देख रहे थे थे ये, उनकी बूढ़ी आँखों में जो आज शुकून था वो आजतक मैंने कभी नहीं देखा था ।
काफी देर ये सब युही चलता रहा। तभी शिव मोहन जी ने उस युवक के कंधे पर हाथ रखके कहा। बेटा तुम अपने पिता जी को अपने घर ले जा सकते हो । तुम्हारे पिता चंद्र शेखर जी अक्सर यहा आया करते थे , और यही उन्होंने इस किताब के कई पन्ने लिखे । जाने से कुछ दिन पहले वो ये किताब मुझे सौप गए थे। और कहा था इसे इस पुस्तकालय में कही किसी कोने में रखियेगा और जब कोई इसे । यु बेसब्रो की तरह ढूढ़ने आये तो मेरा बेटा समझ के उसे ये पुस्तक दे दीजियेगा।
तुन्हारे पिता ने कभी कोई अपना पता नहीं बताया था वरना ये किताब में तुम्हारे घर भिजवा कर अबतक अपने इस आखरी क़र्ज़ से मुक्त हो चुका था। मैं शिव मोहन और उस युवक को बस देखता रहा। उस युवक ने शिव मोहन जी को ह्रदय से लगाया और बड़े आदर सम्मान के साथ अपने पिता को लेकर वहा से जाने लगा। आया था वो तूफ़ान बनकर गया था वो एक एहसास बनकर । मैं भी अपने घर की ओर चल पड़ा था , और रस्ते भर पुस्तकालय में बीती घटना को सोचके सुखद एहसास लेते हुए घर पहुच गया था।
दुसरे दिन जब मैं फिर उस पुस्तकालय में गया तो देखा उस पुस्तकालय में ताला लगा हुआ था, और उसपर धूल बैठी हुई थी, मानो बरसो से उस ताले को किसी ने खोला भी ना हो, निचे इमारत के लोगो से इसका कारण पूछा तो जो जवाब मिला उससे मेरे पैरो तले की जमी खिसक गयी
और कुछ लोगो ने मुझे पागल समझ के वहा से जाने तक को कह दिया ।
लेकिन ये आखिर कैसे हो सकता है
कलतक यहाँ एक पुस्तकालय था , और आज लोग कह रहे है की, की जिस इमारत को मैं पुस्तकालय बोल रहा , वो मात्र एक इस पुरानी ईमारत की जर्जर हिस्सा है जिसे आग लगने के कारण बरसो पहले बंद कर दिया गया था।
लेकिन एक बात और थी कोई यहा शिव मोहन जी को क्यों नही जनता था, वो तो यहाँ बरसो से थे ।
काफी देर मैं उसी इमारत के निचे खड़ा रहा , और खुद को ठगा ठगा महसूस करता रहा , और सोच रहा था की मैं इस कहानी का हिस्सा क्यों था,और अगर मैं इस कहानी का हिस्सा नहीं था तो , क्या कोई शिव मोहन नाम का कोई इन्सान था ही नहीं
क्या कल कोई युवक यहा अपने पिता को
ढूड़ने नहीं आया था .? और ऐसे ही कई सवालो के साथ मैं वहा से शहर के नए पुस्तकालय की ओर बढ़ चला। लेकिन शायद अबसे मुझे उस किताब की तलाश होगी ।
जिसका नाम 'हिन्द राजकुमार था'