Friday, 5 May 2017

जा कर भी जाती नहीं...

यू तो ये दुनिया रंगों से सजी एक सतरंगी महफ़िल हैं,
लेकिन क्या कहूँ मैं मेरे लिए तो सब काला और राख़ के रंगों जैसा हैं ।
तेरे साथ तेरे पास ना होने से आलम ये है की जो लाल रंग इश्क का होता हैं , वो मेरे लहू जैसा हो चला है, जो दौड़ तो मेरे रग रग जिस्म-वो जर्रे जर्रे में रहा लेकिन, लेकिन पल में बह जाने को फर्श पर बेक़रार है ,रंग देना चाहता हु पूरी जमीं  अपने इश्क के रंग से
ये जो सफ़ेद रंग को सबने शुकून का नाम दे रखा है, इसमें मुझे मेरे कफ़न का टुकड़ा नजर आता है। अब जब भी कोई सफ़ेद बेदाग सी चादर देखता हूँ तो जी करता है। ओढ़ के सो जाऊ। और हवा भी थम जाये । कोई आये तो चादर उठाये यु हवा के सहारे दिख जाना अच्छा नही लगता,
तेरे हरे दुप्पटे का क्या केहना ये तो सजता है तुझपे,  खूब जजता है तुझपे,बेरंग सा बेजान  सा तो मैं हो चला हूँ । जिसमे रंग होने के बावजूद बेरंग से हो गया है।
तेरे लबों के रंग का क्या कहना वो सुर्ख सुर्ख लाल रंगों से सजे तेरे लब जब आपस में टकरा जाते है तो,हवाए भी अपना रुख बदल लेते है। खुस किस्मत हूँ मैं जो उन्ही हवाओं से सांसे लेकर जीता हूँ , और  तेरे लबों के पहरेदार , जो बड़ी खुद्दारी से तेरे लबों की हिफ़ाजत करते होगे अपने लबों से उसकी खुसकिस्मती ही हैं ।  वरना सबकी अपनी चाहत अपनी हसरत है। कोई तेरे पास रहकर जी रहा है तो कोई तुझसे दूर रहके जी रहा है, फर्क दोनों में इतना है की उसके पास तेरी जुल्फों की छाव जिनके नीचे वो अपनी शाम-ए-शहर का जिक्र कर सकता है ,और मेरे अपनों के नाम पर बस तेरा नाम है जिसे ले भी नहीं सकता , वरना वजह बे वजह तू बदनाम हो जयेगा, सबको मुक्कमल जहाँ नहीं मिलता लेकिन मुक्कल मौत तो मिल ही जाती है ,
लेकिन मुझे तो न मुक्कमल ज़िन्दगी मिली
न मुक्कमल मौत मिल रही हैं ,
हर रोज मरता हूँ मैं तो, एकबार वाली मौत है की आती ही नही।
और एक तू है की जा कर भी जाती नहीं ।

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