Sunday, 7 May 2017

हद से बेहद...

कहते है हद से से ज्यादा बेहद हर चीज़ बुरी होती हैं,
लेकिन उनका क्या? जिन्होंने प्यार भी हद में रहकर बेहद किया हो।
और उस हद में बेहद में अक्सर ये दिल हद से ज्यादा बेहद रो जाता है , और नफ़रत के नाम के पर फिरसे हद से ज्यादा बेहद प्यार करने लगता है। लाज़मी है किसी को बार बार याद करोगे , प्यार हो ही जयेगा, दिमाग कहेगा की इस शख्स से तू नफ़रत कर, फिर दिल इस बात की इजाज़त नही देता है। और यही पर दिल आके हार जाता है । क्युकी जब उसके बस में उसका कुछ नहीं होता तो, तो उसे एक अजीब सी उलझन होने लगती है, कुछ उस उलझन से बचके निकल जाते है, शायद फ़रिश्ते होते होगे वो । और कुछ उसी उलझन में तह उम्र तक उलझ जाते है।
और इसी उलझन सुलझन के सिलसिले में , दिल अंदर ही अन्दर चुपके-चुपके धीमी आवाज़ में सिसकिया लेता रहता है, और इसकी ना आवाज़ सुनाई देती है न इसके आंशु दिखाई देते है। लेकिन आंखे कभी कभी दगा कर जाती है, बिन मतलब की बरसात के साथ आ जाती है।
और यहा भी देखो। आंशू गिरते है। और खुदको ही भिगाते है। खुद रोते है हमको भी रुलाते है , कभी कभी गुस्सा आता है दिल पर और आँखों पर , की जब इन्हें मेरे बस में रहना ही नही , तो इन्हें अपने जिस्म से बेदखल करदू मैं। आंखे न होगी कमसे कम देख तो ना पाऊंगा, दिल न होगा तो प्यार तो ना कर पाउँगा, ।
और जाते-जाते ये भी एक उलझन ही है की,
ये था क्या? इश्क था ये थी थोड़ी थोड़ी मौत जो
इश्क का चोला पहन , चाहत के दामन को थाम के आया था , और जा मुझे अपने साथ रहा।

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