Tuesday, 25 July 2017
ये रात यूं ही...
कागजी रूह...
सच तो ये है की, जब भी मैं कुछ लिखने की कोशिश करता हु तो कुछ खास लिख ही नहीं पाता।
लेकिन हां, गर कोई दो घूट गम का पीला दे तो, फिर तुम मेरी कलम की चाल देख लो।
ऐसे सरपट-सरपट दौड़ता है गमों पर, दिल के गुमनाम जख्मों पर की खुद कागज़ बोल देता है की,
भला हो उस मैखाने का जिसने तुझे ये दो घूट गम का पिलाया है।
इसी बहाने तेरी रूह के साथ देख मेरी कागज़ी रूह फड़फड़ा उठी है।
Thursday, 13 July 2017
ये जो बात है...
ये बात ना मीरा की साड़ी की है,
ये बात ना ही हीना के हिजाब के पहरेदारी की है,
और ना ही बात कम कपड़ों के किरदारी की है,
क्युकी ये बात जो है ,
वो है अदब और लिहाज़ की !
जो शुरू आंखो की नीयत और
ख़त्म सोच की रूहानी से है।
Monday, 10 July 2017
ये कहां आ गए हम...
राम मंदिर से शुरू हुई थी
गाय माता पर आकर अटक गई,
भईया काश हमको राजनीति आती होती।
सुलभ शौचालय से शुरु हुई थी
स्वच्छ भारत अभियान पर आकर अटक गई, भईया काश हमको राजनीति आती होती
बेरोजगारी से शुरू हुई थी
डिजिटल इंडिया पर आकर अटक गई,
भईया काश हमको राजनीति आती होती।
मंहगाई से शुरू हुई थी
#GST पर आकर अटक गई,
भईया काश हमको राजनीति आती होती।
गड्ढे मुक्त सरकार से शुरू हुई थी
Make in India पर आकर अटक गई,
भईया काश हमको राजनीति आती होती
चाय की चुस्की से शुरु हुई थी
मन की बात पर आकर अटक गई,
भईया काश हमको राजनीति आती होती।
पाकिस्तान क्रिकेट मैच से शुरू हुई थी
चाइना के माल पर आकर अटक गई,
भईया काश हमको राजनीति आती होती।
और ये सब कुछ एक अच्छे दिन शुरू हुई थी
और आज एक अच्छे दिन पर अटक गई।
भईया की काश सच में हमको राजनीती आती होती।
ये लेख पूरी तरह से काल्पनिक है, इसका सत्यता
से दूर दूर तक कोई वास्ता नहीं है।
जय श्री राम
आपका आभार।
Wednesday, 5 July 2017
गाय माता...
क्या ऐसे क्या देख रहे हो ? पहले कभी नहीं देखे क्या हमका ? अरे हम गाय तुम्हारी अम्मा हैं। पहचान लो दुई सिंग है हमरे।
इंसान- अम्मा तनिको चिंता ना करो हम रक्षा करेगे तुम्हारी !
गाय - रहने दो , भैया दुई दिन से तुम्हरे दुवारी पर खड़ी है ,एक रोटी तो तुमसे दिया ना गया।
इंसान- अम्मा घर मे कुछ नहीं है खाने को । कहा जाऊं कमाने को ? कोई काम है तो बताइए ?
गाय- क्यू इतना अच्छा काम तो कर रहे ।मेरे लिए घर फूंक रहे । इंसानों को काट रहे? अच्छा खासा कमाते होगे तुम तो ?
इंसान- कुछ नहीं मिलता उससे ?
गाय- तो फिर इतनी मरा मारी क्यों मचा रखी है?
इंसान- ये लीजिए रोटी खाइए आप !
गाय -अरे लानत है ऐसी रोटी पर । भूकी मर जाऊं लेकिन तेरे घर की रोटी ना खाऊ
इंसान -अरे मैं ब्राह्मण हूं !
गाय- रोटी पर लिख के दिखाओ तुम क्या हो?
दो रोटी तुमसे दी ना जा रही कबसे हाय तौबा मचाएं हो। अरे कुछ कम धंधा करो। और तुम लोग अगर इतना उत्पात ना मचाए होते तो घांस फूस खा के इतनी सदियों से जी रहे हैं। तुम्हारे दो रोटी के लिए तरस नहीं रहे हम ।
घर में पड़ी अम्मा को महीनो से खांसी की दवा ना पीला पा रहे हो चले हो हमको अम्मा बनाने !
नाम बदनाम करके रखे हो हमारा , गाय सुनते ही सब ऐसे भागते है जैसे भूत देख लिए हो। नीक नीक रहो भैया और हमको भी रहने दो। और हा जिसदिन किसी गाय नामक अम्मा को सड़क से उठा कर अपने घर के आंगन में जगह दे पाना उसदिन लड़ जाना मेरे कटने पर ।
इंसान- अम्मा रोटी अब तो खा लो ।
गाय - भीतर जाओ अपनी उस अम्मा को आधी रोटी खिलाओ तब हमको आधी दे देना!
और हा तुम कैमरा वाले भगो तो यहां से । दिनभर पकर पकर करते हो।
और खबरदार जो इस सबके लिए भी चर्चा कराए तो ।
गुलाब...
उन्होंने कहा, पूरे अमीनाबाद के लड़के हमपर मरते हैं तुम मानो न मानो वो हमसे बे-पनाह मोहब्ब्त करते हैं और अगर दराख से झुमका भी दिखा दूं तो ...
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अये ज़िदगी जरा इतना बता दे, तू है कहा और तेरा पता क्या है। गर कभी फुर्सत मिले तो हमसे भी रुबुरु हो ले , ये ज़िन्दगी भी तेरी दी हुई है ये भ...
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अब रातों को नींदों से उठ जाता हूँ, क्यों अजीब सी ये बेकरारी है हा इश्क है तुमसे ये होना तो लाज़मी है। गर आती है तू हर रात के ख्वाबों मे ...
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राम मंदिर से शुरू हुई थी गाय माता पर आकर अटक गई, भईया काश हमको राजनीति आती होती। सुलभ शौचालय से शुरु हुई थी स्वच्छ भारत अभियान पर आकर अट...