Tuesday, 25 July 2017

कागजी रूह...

सच तो ये है की, जब भी मैं  कुछ लिखने की कोशिश करता हु तो कुछ खास लिख ही नहीं पाता।

लेकिन हां, गर कोई दो घूट गम का पीला दे तो, फिर तुम मेरी कलम की चाल देख लो।

ऐसे सरपट-सरपट दौड़ता है गमों पर, दिल के गुमनाम जख्मों पर की खुद कागज़ बोल देता है की,

भला हो उस मैखाने का जिसने तुझे ये दो घूट गम का पिलाया है।
इसी बहाने तेरी रूह के साथ देख मेरी कागज़ी रूह फड़फड़ा उठी है।

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