Tuesday, 25 July 2017

ये रात यूं ही...

ये रात यूं ही ढलते- ढलते ढल जाएगी,
की दिल पत्थर है, फिर भी ओस की तरह बिखर जाएगी।
ये काले बादल यू ही छाते- छाते छा जाएंगे
की बारिश का मौसम है नहीं, बारिश फिर भी आ जाएगी।

           की ईद  को गए हफ्ता- सप्ताह महीना             हो गया है ,
मत निकल घर से, ईद की नमाज़ फिर से हो जाएगी।
खुद को रोक, तुझे भुलाते- भुलाते भूल रहा हूं,
मत लो कोई नाम उसका, एक ही मोहब्बत दो बार हो जाएगी।

और आज मैं यूं ही कहते- कहते केह जाऊंगा,
तूने फिर भी न सुना, तो ये बात बहुत बिगड़ जाएगी।

और फिर मैं यूं ही मरते- मरते मर जाऊंगा,
तूने फिर भी ना पीछे मुड़ के देखा,
तो ये रूह मेरी दो गज के टुकड़े को आसमां में भी तरस जाएगी।

ये रात यूं ही ढलते- ढलते ढल जाएगी,
            की दिल पत्थर है, फिर भी ओस की तरह.                      बिखर.  जाएगी।

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