Tuesday, 27 December 2016

अये ज़िन्दगी जरा इतना बता दे....

अये ज़िदगी जरा इतना बता दे,
तू है कहा और तेरा पता क्या है।

गर कभी फुर्सत मिले तो
हमसे भी रुबुरु हो ले ,
ये ज़िन्दगी भी तेरी दी हुई है ये भूल ना जाना ।

सबसे मिलने के बाद , गर वक़्त हो तेरे पास ।
तो एक शाम तन्हाई का मेरे साथ भी बिता
लेना

फिर मिलके हम इसका मकसाद
और वजूद तलाश लेगे
तुझसे मिलके ही शायद हम
खुद को सवार लेगे

गर सवर गए तो ,
थोड़ा सा वक़्त -ऐ- ज़िन्दगी और दे देना।

वरना शाम-ये - बे मतलब की तो कबसे जी रहा हूँ।

कबसे खुदमे तलाश रहा खुद को मैं।
कबसे खुद को देख रहा खुदसे मैं।

न आजतक मैं खुदसे मिल पाया,
न आजतक मैं खुदको देख पाया।

हर शाम की रात हो जाती है ,
बस इस इंतजार मै

की कोई तो जरिया होगा

कोई तो किन्नरा होगा

की जिसकी मझधार मे
मेरी नैया फसेगी
की जिसकी छाव मे
मेरी रात कटेगी

अये ज़िन्दगी जरा इतना बता दे ।
तू है कहा और तेरा पता क्या है ।

4 comments:

गुलाब...

उन्होंने कहा, पूरे अमीनाबाद के लड़के हमपर मरते हैं तुम मानो न मानो वो हमसे बे-पनाह मोहब्ब्त करते हैं और अगर दराख से झुमका भी दिखा दूं तो ...