Tuesday, 27 December 2016

खुदसे जंग

रात हसीं वो बीत गई जो, 
ये दिन काला लौट आया।
खून चूसने-अश्क़ बहाने,
ये दिन साला लौट आया।
अब सारा दिन खुदसे खुद की जंग
चलेगी ,
कभी ये मुझसे लडेगा
कभी मै इसे।
शाम ढलते ढलते ये दिन भी निकल जायेगा ,

लेकिन सुक्र हें सबकी तरह मेरे हिस्से मे भी एक रात आएगी ।
दिन आधुरा रहा आजका भी इसलिए लाज़मी
सुकून की नींद नहीं आएगी ।

बीती कल की रात की तरह बस
सोचने में हे गुजर जाएगी ।

रात के साये मे , चमकते हर तारे मे ।
ज़िन्दगी की चमक तो दिखेगी ,
पर दिन के निकलते सूरज में, उसकी तपन मे ख़वाब सरे जलते नजर आयेगे ।

शाम की ढलती सूरज की किरणों मे।
ज़िन्दगी थोड़ी लाल थोड़ी मटमैली हो जाएगी
फिर हर रात की तरह ये रात भी
बस काली होकर गुजर जाएगी ।

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