Sunday, 30 December 2018

मैं घर वापस आ गया...





                                                                                                                                                              रोज का नाटक हो गया है न टाइम पर नास्ता रेडी होता है न टाइम पर मेरी कॉफ़ी आती है. कबसे कह रहा हूं नयी बाइक ले दो अब ये खटारा नहीं चलाई जाती. और तो और मेरा मुंबई का ट्रिप भी कैंसिल करा दिया पापा ने. 10 हजार ही तो मांगे थे, मेरे सारे दोस्त ट्रिप पर जा रहे बस मुझे छोड़ के.


इस घर में मेरी बात तो कोई समझता ही नहीं. माँ भी पापा के आगे कुछ नहीं बोल पाती मेरी परेशानी, मेरा दर्द तो कोई समझता ही नहीं. कुछ दिनों के लिए कही चला ही जाता हूँ जब नहीं रहूँगा तो सबको मेरी क़द्र होगी.
और मैं अपने इन्ही सब दर्द को लेकर निकल गया घर से, अनजान सी राहों पर चलता गया चलता गया. लोग मिलते गएं.


थोड़ी दूर पर एक घर दिखा, घर के सामने दिखी कुछ लोगों की भीड़. वहां सभी को रोते हुए देखा तो तुरंत समझ आ गया कि कोई आज रुखसत हो गया इस जहां से. यूं तो यहां सबकी आंखों में पानी था, लेकिन आंसू सिर्फ मुझे उस बूढ़ी माँ की आँखों मे दिखा. मुझे फिर मेरा दर्द याद आ गया, मैं बढ़ चला मैं वहां से आगे.


दूर एक खेत में एक नौजवान किसान दिख गया, जो अपने खेत की सौदेबाजी किसी भूमिहार से कर रहा था. दर्द दूर खड़े उसके बूढ़े पिता की आँखों मे था. लेकिन बेटे को बड़े शहर जाने से रोकने के लिए कोई ठोस विश्वास भी नहीं था. इसीलिए बूढ़ा किसान दबे पाँव आया और कांपते हुए अंगूठे से ठाप लगाकर बेटे के पास खड़ा हो गया.
लड़के ने चंद कागज़ के बण्डल लिए और बस पर बैठ दूर बड़े शहर की ओर रवाना हो गया. बूढ़ा बाप टकटकी लगा देखता रह गया. जबतक शहर वाली बस बूढ़ी आँखों से ओझल ना हो गयी. मुझे फिरसे अपना दर्द याद आ गया, और बढ़ चला मैं वहां से आगे.


तभी एक घर से किसी के चीखने चिल्लाने की आवाज़ सुनाई दी पास जाकर देखा तो, एक शराबी अपनी पत्नी से दारू के पैसे मांग रहा था. पैसे ना मिलने पर वो पत्नी को बालों से घसीटता हुआ बहार ले आया और घर से बेदखल कर दिया. घर से दो बच्चे माँ-माँ चिल्लाते हुए सड़क पर माँ के आंसू पोछने आ गए. इन बच्चो की आँखों में अपने माँ के लिए दर्द था. मुझे फिरसे मेरा दर्द याद आ गया, आगे बढ़ चला मैं.


थोड़ी दूर पर सड़क के किनारे दो बच्चे दिख गएं, सूखी जान सी थी दोनों की रूह. कुछ पैसे मांग रहे थे. बोल रहे थे भैया 3 दिन से कुछ नहीं खाया है. कुछ खाने के लिए दे दो. मैंने जेब से 100 का नोट निकाल कर उनको दे दिया जो पिछली सुबह पापा ने जेब खर्च के लिए दिए थे. खैर इनकी आँखों मे अब ख़ुशी थी. लेकिन न जाने क्यों दर्द मेरा अब थोड़ा और बढ़ चला था.अपने थोड़े से पुराने दर्द को इन सबके दर्द के सामने रखके महसूस किया तो मैंने अपने दर्द को बहुत छोटा पाया. ऐसा लगा मानों मैने अभी तक दर्द देखा ही नहीं था. और सब में, मैं कब अपना दर्द भूल गया मुझे पता ही नहीं चला.


मैं थोड़ी देर वहीं रुक अपने दर्द के बारे में सोचने लगा मेरा दर्द कितना कम था. उस माँ से, जिसने अपना जवान बेटा खो दिया था शायद उनके बुढ़ापे का सहारा था वो. उस बूढ़े बाप से, जिसने अपने संतान के हाथों अपनी संतान को बेचते देखा. उन बच्चों से, जो अपने मां के आंसू भी नहीं पोछ सकते हैं. या इन बच्चों से, जो बिना कॉफ़ी के बिना बाइक के बिना किसी चाहत के बस दो रोटी में खुश हो गएं.

शाम हो चली थी, लेकिन आज मुझे भूख नहीं लगी थी. आज बस अपने घर पहुचने की जल्दी थी. मैं अपने कदम तेजी से घर की ओर बढ़ाने लगा. घर आया तो मां ने हमेशा की तरह गुस्से से अपनी फिक्र जाहिर की. और बोलने लगी कहां था सुबह से नालायक? पूरे मुह्हाले में तलाश चुकी तुझे मैं. चल हाथ मुहँ धुल ले मैं खाना गरम कर के लाती हूं. और हां तेरे पापा ने दफ़्तर में एडवांस की बात की है. खाना खाने के बाद बैग पैक करले अपना. वहां ज्यादा उछल-कूद न करना, ध्यान रखना अपना.

और कॉफ़ी के लिए मुहँ न फुला. ले आईं हूं नई कॉफ़ी की डिब्बिया. मैं कुछ बोल नहीं पाया. मैं कुछ जवाब नहीं दे पाया, चुपचाप खाना आने का इंतजार करने लगा. लेकिन आज बहुत शूकुन था मन में. और दर्द की सही पहचान हो गयी थी मुझे, क्यूंकी मैं आज आपना थोड़ा सा दर्द कहीं छोड़ आया था, मानो बरसो बाद आज मैं घर लौट आया था.

Friday, 14 December 2018

उम्र ढलती जा रही...


उम्र ढलती जा रही

रात एक- एक करके कटती जा रही
वादा था तेरा एक रोज लौट आने का

                                                         फिर भी न जाने क्यूं बेचैनी मेरी बढ़ती जा रही
                                                         चलो माना आंखें खुल के भी बंद कुछ देख नहीं पा रही
                                                          लेकिन क्या तुम बेचैन मेरी धड़कन सुन भी नहीं पा रही

क्या इस रात की तरह मैं भी ढल जाउंगा
या तेरे वजूद होने की ख़बर कोई आयेगी

Monday, 20 August 2018

सफ़ेद कपड़े...



आसमान काला मैला था
एक शख़्स बड़ी उलझन में बैठा था

उसके सारे कपड़े मैले थे
थोड़े सफ़ेद थोड़े रंगीन जैसे थे

उसकी नजरें इधर- उधर खुद को ढूढ़ रही थी

ऊपर से भी उसे कोई देख रहा था
मानो पूरा जहां उसे घूर रहा था

वो कपड़े उतार वहां से भागना चाहता था

लेकिन तभी अचानक से बूँदा- बान्दी शुरू हो गई
वो शख़्स वहीं पर बैठा रहा, उसके सारे कपड़े सफ़ेद हो गए

वो फ़िर से भागना चाहता था
लेकिन तभी जोरो की आंधी चलने लगी

वो शख़्स वहीं बैठा रहा
और कुछ देर बाद आसमान छ्ट के सफ़ेद हो गए

लेकिन उस शख़्स के कपड़े फ़िर से मैले हो गए

Monday, 13 August 2018

याद नहीं करते...


याद नहीं करते

मुलाकात नहीं करते

किसी से बात नहीं करते

किसी से कोई फ़रियाद भी नहीं करते

और ये तब तक चलता रहा जब तक ''उसने'' याद नहीं किया.

अब याद भी करते हैं

सबसे मुलाकात भी करते हैं

जो मिले उससे खूब बात भी करते हैं

और हर दिन खुदा से फ़रियाद भी करते हैं

और ये तब तक चलता रहा जब तक "उसने" याद नहीं कर लिया!

Monday, 6 August 2018

मैं हिंदुस्तान हूं...



ना हरा ना भगवा
ना चोला लाल लिए चलता हूँ,
मैं हिंदुस्तान हूँ।
सर पे तिरंगे का शान लिए चलता हूँ।

ना गीता ना क़ुरान
ना बाइबिल का पाठ लिए चलता हूँ,
मैं हिंदुस्तान हूँ!
अपने दोनों कंधो पर ईमान लिए चलता हूँ।

ना अज़ान ना गुड़गांन
ना ही घंटो की ताल पर चाल चला करता हूँ,
मैं हिंदुस्तान हूँ!
हर दिन जुबां पर देश का राष्ट्रगान लिए चलता हूँ।

ना ईद ना दीवाली
ना गुरु पर्व की याद लिए चलता हूँ,
मैं हिंदुस्तान हूँ!
चारों दिशाओ में अपने तिन रंगों की बहार लिए चलता हूँ।

ना दिल्ली ना गुजरात
ना कश्मीर की बात किया करता हूँ,
मैं हिंदुस्तान हूँ!
जर्रे-जर्रे कतरे-कतरे में हिमालय का ताज लिए चलता हूँ।

ना गोला ना बारूद
ना तोपों की चाल लिए चलता हूँ,
मैं हिंदुस्तान हूँ,
अपने हर पल में अमन और शांति का मशाल लिए चलता हूँ।

मुझे हर रंग बे-रंग सा लगता है...



मुझे हर रंग बे-रंग सा लगता है
                                                            मुझे ये कोरा दिन भी सपना सा लगता है.

मुझे सारे हरे पत्ते सूखे से लगते हैं
मुझे हर सूखे पत्ते बिखरे से लगते हैं.

                                                            मुझे दरिया का पानी कम सा लगता है
                                                            मुझे दो बूंदों से भरा प्याला भी डूबने के काबिल सा लगता है.

                                                             
मुझे हर रंग बे- रंग सा लगता है!

Thursday, 2 August 2018

रेत का घर...



पहले मैं रेत को समेटना चाहता था
क्यूंकी मुझे ऐसा लगता था की रेत पर चलना बहुत ही आसान है, 
लेकिन मेरी यह गलतफ़हमी दो कदम चलने के बाद दूर हो गई.


                                                फ़िर मैं दरिया में तैरना चाहता था
                                                क्यूंकी मुझे मुझे ऐसा लगता था की दरिया में तैरना कोई मुश्किल काम नहीं, 
                                                लेकिन मेरी यह गलतफ़हमी भी दो लहरों के बाद दूर हो गई.


फ़िर एक दिन मैने कुछ नहीं किया
दरिया को रेत से और रेत को दरिया से मिल जाने दिया.
और आज मेरा रेत का एक घर है,
और ठीक मेरे घर के बगल से ही एक दरिया बहती है.

Thursday, 5 July 2018

चांद का गुमान...


आसमान में सभी तारों में चांद की अहमियत
रेगिस्तान में पानी जैसी थी
और बादलों की जैसे, पानी के नीचे जमी रेत.


चांद को अपनी खूबसूरती पर बड़ा गुमान था
               वो हमेशा बादलों का इस बात पर मजाक बना देता था 

              की उनमें कुछ खास नहीं वो सफ़ेद जैसे बे-रंग जैसे है.


फिर एक दिन बादलों ने अपना रंग बदल लिया
और पूरे चांद को घेर लिया.

                 उस दिन कुछ देर के बाद बादल फ़िर से 
          छंट के सफ़ेद बे-रंग से जरुर हो गए
लेकिन फिर उस दिन के बाद

                                  चांद को कभी अपनी खूबसूरती पर गुमान नहीं हुआ.

Saturday, 9 June 2018

रात हसीं वो बीत गई...



रात हसीं वो बीत गई, ये दिन काला लौट आया है,

खून चूसने अश्क़ बहाने ये दिन साला लौट आया है.


अब सारा दिन खुद से खुद की जंग चलेगी

कभी ये मुझसे लड़ेगा, कभी मैं इससे हार जाउंगा,

फिर शाम ढलते- ढलते ये दिन भी निकल जाएगा.



लेकिन शुक्र है,

सबके हिस्से की तरह, मेरे हिस्से में भी एक रात आएगी,

हां, दिन अधूरा रहा है आज का लाजामी है

शूकून की नींद नहीं आयेगी. फिर बीती कल की रात की तरह

ये रात भी बस काली होकर गुजर जायेगी.



रात के साये में

चमकते हर छोटे- बड़े तारे में

जिंदगी की चमक तो दिखेगी

फिर दिन के निकलते सूरज में

उसकी तपन में, ज़िंदगी के ख्वाब सारे जलते भी नजर आयेंगे.



शाम की ढलती सूरज की किरणों में

ज़िंदगी थोड़ी लाल थोड़ी मटमैली हो जायेगी,

फिर हर शाम की तरह ये रात भी ज़िंदगी की तरह

बस काली होकर गुजर जाएगी.

Thursday, 7 June 2018

मैं, मैं कहूं तुम, तुम समझ लेना...




मैं इश्क़ कहूं, तुम इंतजार समझ लेना।

मैं रब कहूं, तुम खुद को आइना समझ लेना।

मैं गीत कहूं, तुम गुलज़ार समझ लेना।

मैं धूप कड़कती धूप का शुकून कहूं, तुम अपनी जुल्फों की छाव समझ लेना।



मैं अब बस कहूं, तुम थोड़ा और समझ लेना।

मैं जब कुछ न कहूं, तब तुम सबकुछ समझ लेना।

मैं ताज कहूं, तुम मुमताज समझ लेना।

मैं बरसों की प्यास कहूं, तुम हीर से रांझे की मुलाकात समझ लेना।



मैं अमावास की काली रात कहूं, तुम चांद कर रहा थोड़ा और श्रृंगार समझ लेना।

मैं गर जो खूबसूरत चांद में दाग कहूं, तुम अपने गले का वो काला छोटा तिल समझ लेना।



मैं कोई छोटी सी छोटी बात कहूं, तुम ढेर सारे चिठ्ठी-तार समझ लेना।

मैं गर चिट्ठी कुछ भी न कहूं, तुम तब भी उसे मेरे प्रेम का सार समझ लेना।



मैं बरसो बाद आज उनका हुआ दीदार कहूं, तुम उस दिन छत पर निकलेगा ईद का चांद समझ लेना।

मैं गर जो ये सर हर चौखट पर झुका कहूं, तुम अपने सदके में अदा हुई मेरी हर नमाज़ समझ लेना।


मैं रातों का ख्वाब कहूं, तुम आंखो से मेरी बरसात समझ लेना।

मैं गर जो बरसात कहूं, तुम आंखों से बहती तेरी- मेरी हर याद समझ लेना।


मैं, मैं कहूं तुम, तुम

समझ लेना।

मैं, मैं कहूं तुम, तुम

समझ लेना।

Saturday, 26 May 2018

सोच का इम्तिहान...


कभी कभी सोचता हूं
की मर्द होना कितना बड़ा पाप है।
फिर सोचता हूँ रहने दो अम्मा के 8, 10 व्रत लड़के की चाह वाले बेकार हो जायेगे।


सोच दो तरह की होती है.
एक सोच
जिसने ने ललिता के ऊपर तेजाब फेंका उसकी जिंदगी जला दी
दूसरी सोच
राहुल जिसने ललिता के शरीर पर गिरे तेजाब को अपनी जिंदगी बना ली।


दोनों में फर्क क्या था सोच क्या थी पता नहीं
लेकिन सोच ही सोच को मात दे सकती है ये समझ आया.
पहले वाले की सोच को दूसरे वाले ने अपनी सोच से मात दी.


जैसे रावण की सोच को राम की सोच ने मात दी थी
सुपनखा की सोच को सीता की सोच ने मात दी थी
सुपनखा अपने सौन्दर्य से लखन को जीतन चाहती थी
वहीं सीता अंतिम समय तक बस राम की बनके रहना चाहती थी
सीता की सोच लंका के विध्वंस के साथ जीती और सुपनखा की सोच पूरी राक्षस जाति के अंत से।


कहीं एक बाप सारी उम्र इसलिए मेहनत कर रहा ताकि वो अपनी बेटी को डोली में बिठा के गाजे बाजे के साथ विदा कर सके,
और कहीं कोई बाप अपनी बेटी को बंद कमरे में रौंद रहा होता है.
आग दोनों में है,
कहीं आग अपनी बेटी आबाद करने की लगी है
तो आग कहीं अपने बेटी को बर्बाद करने की आग लगी है
सोच दोनों की है। लेकिन यहां भी किसी की आग, किसी की आग भारी पड़ी।


सब सोच का खेल है,
आज रात भी आपकी सोच का इम्तिहान होगा
आज भी एक लड़की तुम्हे सुनसान गली पार करते मिलेगी
सोच होगी तो उसे घर तक छोड़ आना
और सोच हुई तो उसे कही ले जाके उसे रौंद आना।

लेकिन इतना याद रखना तुम्हारी हर एक सोच पर कभी न कभी किसी की सोच भारी पड़ेगी
और तब तुम्हें तुम्हारी सोच ही धिक्कारेगी
और तुम कुछ नहीं कर पाओगे।

Thursday, 1 February 2018

मौत का सामान बनाते रहो...


मेरे मन को एक सवाल कई दिनो से कचोट रहा था, जिसका जवाब मैंने कई बार खुद को देना चाहा लेकिन न मन शांत हुआ और न ही कोई मेरी उलझन का जवाब मिला। लेकिन मेरी उल्झन आज तब और बढ़ गयी जब आज मैंने 2019 बजट में रक्षा बजट की राशि 3 लाख करोड़ सुनी। हर की तरह इस साल भी यह राशि कई कई गुना बढ़ी है।


लेकिन सोचने वाली बात ये है की हमने इतने पैसे सिर्फ़ खुद को खुद से बचाने के लिए तय किया हैं। क्योंकि खतरा जिनसे है वो हम इंसान ही है। और ये सिर्फ़ हमारे देश का हाल नहीं है। दुनिया भर में हर साल लाखों अरबों, करोड़ों रुपये सिर्फ़ इसलिए ही खर्च होता हैं कि हम और नए हथियार बना सके, कुछ और नयी मिसाइले बना सके और तमाम ऐसी चीजें बना सके जिनसे हम एक दूसरे को मार सके।


मैं न भ्रष्टाचार की बात करने वाला हूँ, न रोजगार की और न ही किसी विकास योजना की, क्योंकि ये सुबह-शाम की भूख नहीं मिटा सकते। इसलिए मैं सिर्फ बात भूख की करना चहता हूँ। एक आम इंसान की खाने की थाली 30 रुपए की आती हैं. इस थाली में एक किस्म की सब्ज़ी, थोड़ा दाल ,थोड़ा चावल और एक टुकड़ा अचार का होता। और ये सब न मिले तो दो रोटी से भी काम चल जाता हैं। और दो रोटी की कीमत जैसा आपको मुनासिब लगे आप तय कर लीजिए। लेकिन जब यही 30 वाली थाली किसी गरीब के पहुंच से दूर जाता दिखाई देता हैं तो हर सरकर के करोड़ो वाले वादे चुभने लगते है, और बड़ा ठगा-ठगा सा महसूस होता हैं।


लगभग आधे से ज्यादा देश में यही हाल हैं, की उसे अपने पड़ोसी देश से पहले चाँद तक पहुंचना हैं, उससे ज्यादा तकातवर बनना हैं साथ ही अपने देश को खूब चमकाना हैं। भले क्यों न उसके देश की आधी अबादी को रात को भूखा सोए। समझ ही नहीं आता इसे मनाव की तरक्की समझा जाये या उसकी जाहीलियत।


मेरे पास न ढेर सारे रिसर्च हैं न ही ढेर सारे रिकार्ड, की हर दिन भूख से कितने मरते हैं, और कितने घरों में मौत बिन बुलाए आ जाती हैं। और मैं कोई तथ्य ढूँढने जाऊं ही क्यों जब भूख से मौतें मेरे मोहल्लें में भी होती हैं, गिनती का क्या हैं ये ऊपर नीचे होती रहेंगी। लेकिन एक चीज और होगी, जो बहुत ही खतरनाक होगी। आने वाले वक़्त में हर देश के पास ढेर सारी मिसाइले तो होगी, ढेर सारे हथियार भी होंगे, चाँद पर भी सबका राज भी हो ही जायेगा, बटंवारे में ही सही लेकिन सबके हिस्से में थोड़ा-थोड़ा आ जरुर जाएगा।


लेकिन अगर किसी के पास कुछ नहीं होगा, तो वह होगी 'रोटी'। क्योंकि हम सारे इंतज़ाम तो बस हथियारों का कर रहे तो वाजीब है रोटी आयेगी कहां से आएगी? हां लेकिन ये मिसाइल, और हथियार जाया भी नहीं जायेगी, क्योंकि असली जंग तो आने वाले वक़्त में रोटी के लिए ही होगी। इसलिए बनाते रहिए मौत का समान, जब तक आधी रोटी बची है।

गुलाब...

उन्होंने कहा, पूरे अमीनाबाद के लड़के हमपर मरते हैं तुम मानो न मानो वो हमसे बे-पनाह मोहब्ब्त करते हैं और अगर दराख से झुमका भी दिखा दूं तो ...