Wednesday, 25 October 2017

बाबा का मेला...



एक अरसे के बाद जब जेब में कुछ नए सिक्के आए, तो सोचा चलो चले मेला घूम के आएं,

लेकिन जब मेले में पहुंचे तो कुछ समझ नहीं पाएं, मुंह से निकला, अरे ये हम कहां चले आएं.



क्योंकि यहां न तो कोई खिलौना था, और न ही कोई बचपन वाला बचपना,

और कोई आस-पास यहां बर्फ का गोला भी है बेचता नहीं दिख रहा, क्या कोई रास्ता तो नहीं भूल आए हम.



वो छोटे-बड़े झूले कहा गए, वो खट्टी मीठी चटनी वाला चाट का ठेला कहां गया,

और कोई क्यों नहीं यहां आस-पास बांसुरी हैं बजा रहा, क्या कहीं खजला वाली दुकान पीछे तो नहीं छोड़ आए.



वो जादूगर कहां गया, उसकी पल में बनती लड़की नागिन कहां गई,

और वो बंदर मदारी कहां गए, क्या सबकुछ छोड़ वो भी किसी दूर नगरी को चले गए.



वो सर्कस वाला तो कलतक यहीं था, उसका जोकर तो कल बाजार में भी मिला था,

और हां, उसके दोनों बब्बर शेर कहां गए, क्या इंसानों को इस जंगल में छोड़ वो भी घर को चले गए.



वो पिज़रे बेचने वाला वो रंग-बिरंगे झंडे बेचने वाला कहा गया,

और वो पतंग माँझे से सजती बच्चों को लुभाने वाली दुकान कहां गई,

और कोई बच्चा क्यो नहीं है आस-पास यहां गुब्बारे के लिये जमीन पर लोट-पोट होता दिख रहा,

क्या हवाओं का रूख बदल सा गया, क्या शहर की उड़ती काली धूल ने गाँव की हवाओं में भी जहर घोल दिया.



वो कठपुतली का खेल कलतक यहीं तो लगा करता था, वो शख्स दो लंबे-लंबे बांशो पर लाठी लिए यहीं रस्सियों पर ही तो चला करता था,

क्या उसके सारे खेल ख़त्म हुए, या हमी मोबाइल गेम के आगे अपना बचपन भूल गए.



वो छोटे-बड़े पर्दे वाले सिनेमाघर कहां गया, वो सुबह से बिकती उसकी सुबह से बिकती 10,10 शो की टिकटे कहां गयी,

और कोई क्यों नहीं हैं मेरा हाथ पकड़ के मुझे रामलीला दिखा रहा, क्या इस छोटे से मोबाइल स्क्रीन पर सारे रंगमंच सिमट के है रह गए.



वो बाबा जी की कुटिया तो कलतक यहीं थी, हाथों में चंदन लिए, माला लिए कलतक यहीं तो बैठा करते थे, 
क्योंकि पिछली बार मैंने उनको अपना हाथ दिखाया था, मेरा आने वाला कल बहुत अच्छा होगा, उन्होंने ऐसा मुझे यकीन दिलाया था, 
क्या वो भी अपने भाग्य से हार गए, क्या पिछले मेले के दंगों में वो भी अपनों के हाथों मारे गए.



वो बिंदी, चूड़ी, गाजरों की दूकान वो रंग बिरंगे दुप्पटे बेचने वाला कहां गया, 
और कोई क्यों नहीं बच्ची यहां आस-पास गुड्डे-गुड़िये के लिए रोती दिख रही,  
क्या कोई बच्ची अब जन्म लेती ही नहीं, या लेती है तो बड़ी होती नहीं.



और यहां पसरा इतना सन्नाटा क्यूं है?



ऐसे कई सवाल लिए मैं उस दिन मेले में घंटों भटकता रहा, फिर पास वाली जिंदगी की दुकान से थोड़े नए सपने, थोड़ी नई चाहते, कुछ और हसरतें खरीद कर घर वापस आ गया, हां, घर आकर थोड़ी हैरानी तो थी. लेकिन कर भी क्या सकते थे, इतने दिन से एक बेहतर जिंदगी जीने की परेशानी भी तो थी.

या शायद- या शायद, बाबा के मेले की बच्ची बस इतनी सी ही कहानी थी.

Tuesday, 10 October 2017

आलू खट्टे है...




मैं शायरी लिखता हूं और हल्के फुल्के मजाक भी करता हूं, और इन सबके आलावा सच लिखने की भी कोशिश करता हूं। लेकिन आजकल राजनीतिक मुद्दों पर लिखने से थोड़ा बचता हूं। वो इसलिए, क्योंकि मुझे इनबॉक्स में या मेरे पोस्ट पर मां बहन की गली खाना नहीं पसंद, ना ही मेरे पिताजी के पास 10000000 रुपए है जो दे से सके। मैंने तो शून्य भी उंगली पर गिनकर लिखा है। सोचो देना पड़ता तो क्या होता। करेजा ही फट जाता शायद।


ऐसा पहले था या नहीं था, या था तो मैंने गहन चिंतन नहीं किया था। पता नहीं। लेकिन आजकल मैने ये मेहसूस किया है की सरकार के खिलाफ बोलना कितना मुश्किल हो गया है। अब तो होली से पहले गोली मार दी जाती है। और दीवाली से पहले फोड़ दिया जाता है। आज कल कुछ भी बोलने पर राष्ट्रविरोधी घोषित कर दिया जाता है।


अरे 99 कलम तो बिक ही चुकी है, किसी एक तो लिखने दो बोलने दो। या नहीं पसंद तो सारे अख़बार सारे चैनल सारे वेब पोर्टल जो 1 की गिनती में आते है उनको बंद करा दो। हां क्योंकि जब सवाल ही सुनने नहीं पसंद तो जो आप बोले वही सही, आलू खट्टा होता है वो भी सही, या तो फिर कोई कह रहा की आलू काना है तो चेक करिए। वरना मूर्ख जनता तो काने आलू की सब्जी 5 साल खाएगी ही।



सच पूछो तो हॉस्टल के मेस जैसा हाल हो गया है सरकार का, जो कहे वही सही जो बनाए वही ताजा फिर भले ही क्यों ना खाना दो चार दिन का बासी ही हो। देशभक्ति की नाम पर मन मानी करना बंद करिए, क्यूंकी जब देश ही बिक जाएगा तो देशभक्ति किस काम की रहेगी। 


मैं सवाल छोड़ के यहीं जा रहा क्यूंकी मुझे है कायदे की सर्दी भईया, और हां खिड़की मेरी कांच की नहीं है इसलिए पत्थर मार के देख सकते है। लेकिन सवाल मेरा वही है, की जब आलू में छेद नहीं है तो खुलकर पूरी सब्जी की रेसिपी बताइए। या फिर बोल दीजिए मेस वाले पांडे की तरह जैसी भी है यही खानी है अब।

Thursday, 21 September 2017

नवरात्रि की ढेर सारी शुभकामनाएं...



नवरात्रि की ढेर सारी शुभकामनाएं उन्हें भी एक सरसरी निगाह से किसी देवी का का आंखो से बलात्कार कर देते है. जो काले,पीले नीले चश्में के पीछे से ब्रा का साइज और कलर अपनी सोच के हिसाब तय कर लेते है.
ये तब तक उन्हें देखते है, जबतक वो खुद ना केह दे, "उतार दूं क्या? देख ही लो ".

उन्हें भी ढेर सारी शुभकामनाएं जो, किसी देवी के कपड़े उतारते देख, फोन ऑन करके बस वीडियो बनाते है, और रात को उसकी सुरक्षा का जिम्मा फेसबुक और सोशल मीडिया पर उठाते है.

इसलिए नवरात्रि की ढेर सारी शुभकामनाएं सिर्फ उनकों जो किसी गली में भटकी हुई किसी अकेली देवी को उसकी चौखट तक छोड़ के आते हैं, बदले उसके उसका नंबर नहीं मांग के आते हैं.

Thursday, 17 August 2017

ये आग हैं...

मुझे सोशल मीडिया काफी पसंद है, और इसी से मैंने काफी कुछ सीखा भी है. लेकिन पिछले काफी दिनों से मैंने लिखना बंद कर दिया था. और सभी इसका कारण पूछ रहे थे.
लेकिन सच तो ये है की मैं अब भी लिखता हूँ, बस फेसबुक पर लिखना बंद कर दिया है, वो इसलिए क्योंकि यहाँ हर जगह हिन्दू-मुसलमान मंदिर-मस्जिद, पर तर्क चलते है
हमें हर चीज़ फेसबुक पर अपडेट करने की आदत पड़ चुकी है, बगल में खड़ा लड़का अगर किसी लड़की से बदतमीजी कर रहा तो सबसे पहले हम फेसबुक पर लाइव विडियो बनायेगे फिर कुछ बोलेगे,
अगर कोई बच्चा भूख से रो रहा है तो, सबसे पहले उसकी फोटो क्लिक करेगे तब जेब में हाथ डालके सिक्के खंगालेगे,
कुछ बुरा होता हुआ दिखेगा तो अपनी आंखे बंद करके फ़ोन की आंखे खोलेगे.
हर चीज़ बस सोशल करनी है,
भाई पहले सामाजिक बनो तो, समाज के लिए कुछ करो तो सही, ज़मीं पर थोड़ी इन्संनियत दिखाओ तो सही,
अभी हाल ही में गोरखपुर का मामला देखा, फेसबुक पर खूब हाय तौबा मची,फलाना ढमाका, लेकिन क्या हम से किसी ने गोरखपुर जाके उन बच्चो के परिवार से मिलने की कोशिश की?वहा जाके उनका दर्द बाँटना ? चाहा नहीं न ? हम बस दिखावा करते है ,
लाइक,कमेंट,तारीफ ने हमें इतना बांध दिया है की, हमारी भावनाए तक बिकाऊ हो गयी है, जो कुछ लाइक कमेंट में बिक जाते है.
ये जो पोस्ट आप कॉपी पेस्ट करते है, वो महज पोस्ट नहीं है, ये एक आग है, और
ये आग फैलाना बंद करिए, इसकी ताकत का अंदाज़ा आपको अभी नहीं है, एक बार दो बार, लगातार अगर आप कहेगे की वहा वो चल रहा घट रहा तो , वो सच हो न हो. लेकिन कुछ असर जरुर छोड़ जाती है,
और मुझे ये समझ नहीं आता की देश में इतने मुद्दे है इतनी परेशानियाँ है ,फिरभी क्यों लोग धर्म कर्म और आग पर ही क्यों टिके है? सिमटे है
लखनऊ में अगर एकदिन ढंग से बारिश हो जाये तो, पूरे शहर में नाव चलाने जैसा हाल हो जाता है.
शहर के अलग-अलग हिस्सों में आज भी इतनी गंदगी है की बिना मुह पे रुमाल रखे हम वहां से नहीं निकल सकते ,
भाई सलाद में टमाटर नहीं देता ढाबे वाला इतना सस्ता हो चला है टमाटर.

9 बजे ऑफिस के लिए निकलो तब भी बॉस से डांट पड़ ही जाती है.
ट्रैफिक भाईसाब, ट्रैफिक, ऑटो से कूद जाने का मन करता है, इतना गुस्सा आता है कभी-कभी
परेड पर जाने वाली लड़की का बलात्कार हो जाता है , नेता जी फिर से झूठे वादे में फंसा जाते है.
पानी इतना गन्दा है शहर का की ,100 रूपए का पानी खरीद के पीना पड़ता है पूरे दिन.
गाय माता पूरे शहर में पन्नी खाती, धूल फांकती नजर आती है, गौ रक्षको से हाथ जोड़ के विनती है की इनको कोई घर दीजिये, इन्हें मारने वाले कम है, ये खुद ही भूख से दर-दर भटक के मर जाती है,
सिग्नल पर गाड़ियों से ज्यादा हाथ में कटोरे पकड़े बच्चे नजर आते है, दिल रो जाता है, कितनो की भूख मिटाऊ कितनो को भगवन के सहारे छोड़ दूँ.
नौजवान आत्महत्या कर रहा है, नौकरी कहा है? मैट्रिक्स पास मुझे निशांतगंज छोड़ के आ रहा है,मीडिया में पढाई करने वाला मेरे बाल काट रहा है,
काम पर सवाल नही उठा रहा , बस एक सवाल पर सवाल उठा रहा की,क्या मेरा भी यही हाल होगा, ?
चारबाग पर खुला व्यापार नजर आता है, जहा चंद टुकड़ो के लिए, राते बिक जाती है,
ऐसे एक नही,दस हजार मुद्दे, और परेशानियाँ है, जो हिन्दू,मुसलमान,गाय मंदिर-मस्जिद के आगे दिखते ही नहीं.
अरे मत परेशां हो, आज भी गाय माता को पूजा जाता है
मस्जिद में मुसलमान से ज्यादा हिन्दू नजर आता है, गणेश पूजा के लिए चंदा एक मुसलमान भी देता नजर आता है.
मेरे ऑफिस में शबाज़ और विशाल साथ में खाना खाते नजर आते है,
ताईबा दीदी के नमाज़ लिए ऑफिस को ही हम मस्जिद बनाते है,
कही कोई खतरा नहीं हैं भाई,ज़मीनी स्तर पर सबकुछ सही है, ये फेसबुक पर इधर उधर लिखना आग फैलाना बंद करिए, इंसानियत को बस इन्सान से ही खतरा है,
और याकिन मानिये बड़ी फ़िक्र हो रही है,की कुछ दिन और युही चलता रहा तो
जहा से शुरुवात की थी हमने फिरसे वही आके रुक जायेगे,
और सच में तब आप लिख के भी कुछ नहीं कर पायेगे,
धर्म बचाने की कोशिश में इंसानियत का क़त्ल करना बंद करिए, जिसने तुम्हे बनाया वो खुद की हिफाज़त कर लेगा, हो सके तो थोड़ी इबादत घर के मंदिर और पलग पर लेती माँ के कदमो में दिखा लो, यहाँ से ज्यादा शुकून वहां मिलेगा.

Saturday, 12 August 2017

#shame_on_you_dear_humanity

मेट्रो नहीं चहिये साहब
स्टेडियम भी नहीं चाहिए
रोजगार भी अपने पास रख लो
ये आवास और ये झूठे विश्वास भी रखलो 
मेरा स्कूल का बस्ता और फट्टी किताबे भी ले लो
बस थोड़ी सी सांसे दे दो,
कल से दम घुटा जा रहा हैं
ऐसा लग रहा है, की किसी ने गले के ऊपर लाशो का बोझ रख दिया हो
ऐसा लग रहा है,, की किसी और के हिस्से की सांसे लिए जा रहा हूँ!
इतनी घुटन हो रही है की सांसे ऊपर चढ़ाई ही ना जा रही है,
हाथ कांप कर रहे सोचने में ही की बिना सांसो की ज़िन्दगी कैसे होती है अभी पल भर के लिए बिना सांसे के जीने की सोची, कसम से हो ही नहीं पाया !
फिर
कल उन बच्चों का क्या हुआ होगा?
जब नन्हे-नन्हे पैर उनके पलने में छटपटाये होगे,
कमाल है कुछ सुनाई ही नहीं दिया,
लेकिन सुनाई देगी,
साहब याद रखियेगा ये, हिसाब होगा ,
यहाँ नहीं तो ऊपर होगा, लेकिन इन सांसो का हिसाब तो देना होगा .
और हा साहब राम मंदिर, में भी जाके ये पाप नहीं धुलने वाले...

Tuesday, 25 July 2017

ये रात यूं ही...

ये रात यूं ही ढलते- ढलते ढल जाएगी,
की दिल पत्थर है, फिर भी ओस की तरह बिखर जाएगी।
ये काले बादल यू ही छाते- छाते छा जाएंगे
की बारिश का मौसम है नहीं, बारिश फिर भी आ जाएगी।

           की ईद  को गए हफ्ता- सप्ताह महीना             हो गया है ,
मत निकल घर से, ईद की नमाज़ फिर से हो जाएगी।
खुद को रोक, तुझे भुलाते- भुलाते भूल रहा हूं,
मत लो कोई नाम उसका, एक ही मोहब्बत दो बार हो जाएगी।

और आज मैं यूं ही कहते- कहते केह जाऊंगा,
तूने फिर भी न सुना, तो ये बात बहुत बिगड़ जाएगी।

और फिर मैं यूं ही मरते- मरते मर जाऊंगा,
तूने फिर भी ना पीछे मुड़ के देखा,
तो ये रूह मेरी दो गज के टुकड़े को आसमां में भी तरस जाएगी।

ये रात यूं ही ढलते- ढलते ढल जाएगी,
            की दिल पत्थर है, फिर भी ओस की तरह.                      बिखर.  जाएगी।

कागजी रूह...

सच तो ये है की, जब भी मैं  कुछ लिखने की कोशिश करता हु तो कुछ खास लिख ही नहीं पाता।

लेकिन हां, गर कोई दो घूट गम का पीला दे तो, फिर तुम मेरी कलम की चाल देख लो।

ऐसे सरपट-सरपट दौड़ता है गमों पर, दिल के गुमनाम जख्मों पर की खुद कागज़ बोल देता है की,

भला हो उस मैखाने का जिसने तुझे ये दो घूट गम का पिलाया है।
इसी बहाने तेरी रूह के साथ देख मेरी कागज़ी रूह फड़फड़ा उठी है।

Thursday, 13 July 2017

ये जो बात है...

ये बात ना मीरा की साड़ी की है,
ये बात ना ही हीना के हिजाब के पहरेदारी की है,
और ना ही बात कम कपड़ों के किरदारी की है,

क्युकी ये बात जो है ,
वो है अदब और लिहाज़ की !

जो शुरू आंखो की नीयत और
ख़त्म सोच की रूहानी से है।

Monday, 10 July 2017

ये कहां आ गए हम...

राम मंदिर से शुरू हुई थी
गाय माता पर आकर अटक गई,
भईया काश हमको राजनीति आती होती।

सुलभ शौचालय से शुरु हुई थी
स्वच्छ भारत अभियान पर आकर अटक गई, भईया काश हमको राजनीति आती होती

बेरोजगारी से शुरू हुई थी
डिजिटल इंडिया पर आकर अटक गई,
भईया काश हमको राजनीति आती होती।

मंहगाई से शुरू हुई थी
#GST पर आकर अटक गई,
भईया काश हमको राजनीति आती होती।

गड्ढे मुक्त सरकार से शुरू हुई थी
Make in India पर आकर अटक गई,
भईया काश हमको राजनीति आती होती

चाय की चुस्की से शुरु हुई थी
मन की बात पर आकर अटक गई,
भईया काश हमको राजनीति आती होती।

पाकिस्तान क्रिकेट मैच से शुरू हुई थी
चाइना के माल पर आकर अटक गई,
भईया काश हमको राजनीति आती होती।

और ये सब कुछ एक अच्छे दिन शुरू हुई थी
और आज एक अच्छे दिन पर अटक गई।
भईया की काश सच में हमको राजनीती आती होती।

ये लेख पूरी तरह  से काल्पनिक है, इसका सत्यता
से दूर दूर तक कोई वास्ता नहीं है।

जय श्री राम
आपका आभार।

Wednesday, 5 July 2017

गाय माता...

क्या ऐसे क्या देख रहे हो ? पहले कभी नहीं देखे क्या हमका ? अरे हम गाय तुम्हारी अम्मा हैं। पहचान लो दुई सिंग है हमरे।
इंसान- अम्मा तनिको चिंता ना करो हम रक्षा करेगे तुम्हारी !
गाय - रहने दो , भैया दुई दिन से तुम्हरे दुवारी पर खड़ी है ,एक रोटी तो तुमसे दिया ना गया।
इंसान- अम्मा घर मे कुछ नहीं है खाने को । कहा जाऊं कमाने को ? कोई काम है तो बताइए ?

गाय- क्यू इतना अच्छा काम तो कर रहे ।मेरे लिए घर फूंक रहे । इंसानों को काट रहे? अच्छा खासा कमाते होगे तुम तो ?

इंसान- कुछ नहीं मिलता उससे ?

गाय- तो फिर इतनी मरा मारी क्यों मचा रखी है?

इंसान- ये लीजिए रोटी खाइए आप !

गाय -अरे लानत है ऐसी रोटी पर । भूकी मर जाऊं लेकिन तेरे घर की रोटी ना खाऊ

इंसान -अरे मैं ब्राह्मण हूं !

गाय- रोटी पर लिख के दिखाओ तुम क्या हो?

दो रोटी तुमसे दी ना जा रही कबसे हाय तौबा मचाएं हो। अरे कुछ कम धंधा करो। और तुम लोग अगर इतना उत्पात ना मचाए होते तो घांस फूस खा के इतनी सदियों से जी रहे हैं। तुम्हारे दो रोटी के  लिए तरस नहीं रहे हम ।
घर में पड़ी अम्मा को महीनो से खांसी की दवा ना पीला पा रहे हो चले हो हमको अम्मा बनाने !

नाम बदनाम करके रखे हो हमारा , गाय सुनते ही सब ऐसे भागते है जैसे भूत देख लिए हो। नीक नीक रहो भैया और हमको भी रहने दो। और हा जिसदिन किसी गाय नामक अम्मा को सड़क से उठा कर अपने घर  के आंगन में जगह दे पाना उसदिन लड़ जाना मेरे कटने पर ।

इंसान- अम्मा रोटी अब तो खा लो ।

गाय - भीतर जाओ अपनी  उस अम्मा को आधी रोटी खिलाओ तब हमको आधी दे देना!

और हा तुम कैमरा वाले भगो तो यहां से । दिनभर पकर पकर करते हो।
और खबरदार जो इस सबके लिए भी चर्चा कराए तो ।

Wednesday, 24 May 2017

सहारनपुर की आग...

#save_saharanpur_sabbirpur

दुनिया का सबसे बड़ा डर होता है,जब कोई आपके दरवाजे की कड़ी खटखटाये और आपको ये ना पता हो, की दरवाजे के उसपार खड़ा व्यक्ति आपके परिवार को मारने आया है, या आपके घर के बेटी का बलात्कार करने आया है ।ये सोचके और लिखके । दिल,दिमाग और मेरी कलम कांप सी जाती है।
जब पता चलता है ये बात काल्पनिक नहीं बल्कि सहारनपुर की सच्चाई है। जो वहा घटित हो रहीं हो, वहा और भी बड़े कारनामे हो रहे, लेकिन वो आज के समाज में होने वाले अपराधों के हिसाब से आम बात है। जैसे गुट बना कर किसी की नाक में चक्कू घोप देना, किसी के परिवार को घरमे बंद करके घर को आग लगा देना , बीच नुक्कड़ पर उसको जिन्दा जला देना।
पिछले 20 दिन से सहारनपुर एक ऐसी आग बनके जल रहा है जिसे रोकना वहां के ना तो प्रशासन के बस में है ना ही शांति प्रवाचन देने वालो प्रव्क्तावों के बस में है, वहां का आलम ये है की एसएसपी जैसे बड़े अधिकारी के घरमे भी लोग चक्कू बंदूके लेकर घुस रहे है, खुद एस पी की धर्मपत्नी ने ये कहाँ की अगर मैं वहा से अपने बच्चो को लेकर नहीं भागती तो, उनपर भी गोलिया और चक्कू छुरीया चल जाती, अगर ऐसे बड़े अधिकारी के परिवार को जब ये महसूस हो रहा तो जरा सोचिये वहां रह रही आम जानता का क्या हाल है, अभी कल ही योगी जी इस मुद्दे पर कह के गए की वहां कुछ नही हो रहा,और उसी दिन वहां एक व्यक्ति को मारा गया ,दुसरे का घुठना गायब मिला। योगी जी को  सब्बीरपुर जाके देखना चाहिए की कैसे वहां घर जल रहे , घरो में रह रही लड़कियों के साथ कैसे सामूहिक बलात्कार हो रहे हैं, और
वहां आलम इस तरह है की जैसे भारत और पाकिस्तान के बटवारे के वक़्त जब घरों में घुसकर बलात्कार होते थे , ठीक वैसे ही आज सब्बीरपुर में हो रहा।
मैंने पुरे लेख में दंगे किन समुदाय के बीच हो रहा इसलिए नही लिखा । क्युकी जहा ऐसे अपराध हो रहे हो , वहां मामला दलित और ठाकुर से बढ़कर इन्संनियत की हो  जाती है,जो वोट बैंक से परे हैं ।पिछले 20 दिन में किसी न्यूज़ चैनल ने किसी अखबार ने सही ढंग से इस सब्बीरपुर के आग को कही भी ठीक ढंग से दिखाया ही नहीं , वो इसलिए की वहां मीडिया की गाड़ियों को जलाया जा रहा हैं , देखते ही पत्रकारों को को खदेड़ा जा रहा । यहाँ हमारे प्रधानमंत्री जी को मैनचेस्टर में हुए हमले की बड़ी चिंता है ,और निंदा हैं।लेकिन साहब अपना देश अन्दर जल रहा है जरा उसको भी देख लीजिये । कश्मीर में दो पत्थर चलते है ,हवा #UN तक जाती है, वहीँ सब्बीरपुर में घरो में घुसकर सामूहिक बलात्कार हो रहे,और इसकी खबर #Delhi तक नहीं पहुची । बाबू ये तो बड़ी नाइंसाफी है । 2021 की प्लानिनिग छोड़िये अभी 2019 के हाल पर गौर करिए । सब्बीरपुर के अन्दर झांक के देखिये जितना लिखा है उससे ज्यदा आग लगी है वहां।

Sources of news टीवी पर अखबारों में पिछले 20 दिन के दिखाए गए छोटी मोती घटनाये और वायरल विडियो । और कुछ लोगो की आधी अधूरी आप बीती । जिनका जिक्र करना मुनासिब नहीं।

Tuesday, 23 May 2017

प्रहार...

कभी किसी को अपने जीवन की एक कमजोरी मत बताइये

वरना वो आपकी एक कमजोरी को
आपके जीवन का स्तम्भ समझ कर

उसपर रोज प्रहार करने लगेगा

और तब यह निश्चित है की

तुम लोहे जितने सख्त होंने के बावजूद

एक वक़्त के बाद लगातार चोट के बाद टूट जाओगे ।

Monday, 22 May 2017

हिन्द राजकुमार...

इमारत में पांचवी मन्जिल पर एक एक पुस्तकालय है, पुराने पुस्तकालय की बात करे तो शहर में यह इकलौता पुस्तकालय बचा था।
बाकी इमारत की सभी मंजिलो पर सरकारी दफ्तरों का जमवाड़ा है,शाम के 4 बजे होगे शायद, मैं पुस्तकालय में अपनी टेबल पर बैठा अपनी पसंदीदा पुस्तक पढ़ रहा था । पुस्तकालय में कर्मचारी में एक ही सज्जन थे जिनकी आंखे लगभग ओझल सी हो चली थी, फिरभी सभी किताबो को एक सरसरी निगाह में देख के बता देते थे , की वो पुस्तक वहा रखी है। ये उनका प्रेम था शायद पुस्तकों के प्रति जो बूढ़ी आँखों से भी ओझल ना होती थी।
उनका नाम शिव मोहन था और काफी चिड़चिड़े स्वभाव के हो गए थे,लाज़मी था क्युकी सभी आने वाले लोग पुस्तक पढ़ने के बाद इधर-उधर रख के चले जाते थे ,इसलिए शिव मोहन जी को वो सभी पुस्तके रखने में बड़ी कठनाई होती थी।
और मुझे यहाँ रोज आना होता है  इसीलिए मैं पुस्तक पढ़ने के बाद जहा से लाता वही रख के आता ,क्युकी मुझे शिव मोहन जी के गुस्से का शिकार नहीं होना था, मेरे टेबल के बगल में एक पुराने किताबों की इमारत थी काफी पुरानी और फटे किताबों का ढेर था वो,जिसे पढ़े जिसे छुए ना जाने कितनी सदी बीत गयी हो। मैंने कई बार उन्हें पढ़ने की रूचि दिखाई लेकिन उसपर शिव मोहन की आँखों की सहमती ना बनी तो मैंने उसे कभी छुवा नही, और पुस्तकालय में कई अन्य रोचक पुस्ताके रखी थी इसलिए मैंने शिव मोहन जी की आँखों से बैर ना करना ही ठीक समझा। मैं अपनी पुस्तक के अगले पन्ने पर जाने ही वाला था की,मेरी नजर एक नौजवान पर पढ़ी, जींस,टीशर्ट हाथ में चमचमाती घड़ी,और फ़ोन पर कुछ देखते हुए उसका आगमन पुस्तकालय की और तेजी से हुआ। अमुमन आज की युवा पीढ़ी में पुस्तकालय मैं आना जाना कम ही होता था इसलिए मैंने ज्यदा ध्यान न दिया उसके बाद ,मैं फिरसे अपने पुस्तक को सरसरी निगाह से पढ़ने लगा , लेकिन आगले पन्ने पर जैसे ही मैं जाने वाला था मेरी नजर ऊपर उठी तो देखा पूरा पुस्तकालय मेरे एक पन्ने के अंत तक उथल-पुथल हो चुका था, और वो नौजवान अभी भी बड़ी बेसाब्री से किताबे इधर उधर किये जा रहा था, शिव मोहन जी के कछुवे जैसे कदम तेजी से खरगोश के भाति उसकी और बढ़ी और , कुछ ही लम्हों में शिव मोहन जी ने उसकी लावे जैसे चाह को ठंडे पानी की तरह शांत कर दिया, और साफ साफ लफ्जों में कहा चुपचाप बैठ जाओ वरना पुस्तकालय से निकाल दिए जाओगे। युवक झुकी नजरों से थोड़ा और उथल-पुथल करने की इजाज़त चाहता था, मगर शिव मोहन जी की इंकार भरी आँखों को देख कर उसकी चाहत का अंत हुआ और वो थक हार कर मेरी टेबल के किनारे बैठ गया। लेकिन उस युवक की आंखे अभी भी पुस्तकालय की सभी पुस्तकों पर थी, मैंने उसकी आंखे देखी तो पता चला वो अपनी आँखों से मानो पुस्तकालय की लाखों किताबे चंद लम्हों में पढ़ लेनी चाहती हो, इतनी ललक और इतनी किताबो के प्रति चमक थी उनमे।
मैं अपनी पुस्तक बंद करके रखने के लिए उठ ही रहा था कि, आखिरकार उस युवक का मुख से पहला शब्द निकला जो मेरे लिए था उसका सवाल था वो। की आपने यहाँ 'हिन्द राजकुमार' नमाक कोई पुस्तक देखी है क्या?
मैंने ऐसी कोई पुस्तक अभी तक पढ़ी नहीं थी , ना ही  देखी थी इसलिए मेरा उत्तर ना था ।मैंने अपनी पुस्तक उठाई और उसे वही रखा जहा से उठाया था, लेकिन उसके बावजूद शिव मोहन जी की आंखे लाल थी, इसका श्रेय उस युवक को जाता है जिसने यहाँ पर इतनी उथल-पुथल मचाई थी. मैंने हलकी सी मुस्कान में शिव मोहन की आँखों को जवाब दिया , की मैंने कुछ नहीं किया जी । मैं वापस अपनी टेबल पर आया अपना चस्मा उठाने ,लेकिन  उस युवक का उतरा हुआ चैहरा देखकर मुझसे बिना यह पूछे रहा न गया की , क्यों वो उस पुस्तक के लिए इतना परेशान है।
तब उस युवक ने बताया की मेरे पापा एक लेखक थे, जिन्होंने एक किताब लिखी थी जिसका नाम 'हिन्द राजकुमार था। माँ ने मुझे बताया की उनको पुस्तकों से बड़ा लगाव था, माँ हमेसा कहती है की उनकी सौतन पापा की किताबे थी,और कई बार उनका पापा से झगड़ा भी इसी वजह से हुआ। मैंने अपना पापा को कभी नहीं देखा,वो कैसे दिखते थे, कैसे बोलते थे, कैसे चलते थे!जब गुस्सा होते थे तो वो भी क्या सबके पापा की तरह डांटते थे।
और उनके प्यार करने का अंदाज़ कैसा था। इन सभी चीजों से मैं अंजान हू। मेरी माँ ने बताया की जब मैं उनकी कोख में था तब ही उनको भगवान जी ने अपने पास बुला लिया था। लेकिन माँ ने बताया  की जब मैं पैदा होने वाला था तो वो मेरे नाम के लिए एक किताब लिख रहे थे,और जाने से पहले उन्होंने वो किताब किसी पुस्तकालय में रख दी थी। मुझे बस एकबार उस किताब को छूना है। अपने पापा को छूना है।
उस युवक की बाते सीधे दिल पर लग रही थी, और बातो बातो में कब मेरी आंखे नम हो गयी पता ही नहीं चला।
शिव मोहन जी काफी समय से पुस्तकालय में थे , और सभी पुरानी किताबो का ब्यौरा भी था उनके पास,और दूर से ही वो उस युवक की सभी बाते सुन रहे थे । मैंने उनसे नजरे मिलायी और आँखों ही आँखों में प्रश्न किया। लेकिन उत्तर आंख के दूसरी ओर हों जाने पर उनकी । मैं उस युवक से फिर से बात करने लगा । मैंने पूछा , तुम्हारे पिता जी ने पुस्तक कब लिखी थी ?
युवक ने बताया , मुझे मेरी माँ ने कभी इसके बारे में ज्यदा बताया नही,बस उन्होंने ये बताया है की उस पुस्तक का नाम हिन्द राजकुमार है , और वो उनकी लिखी पहली और आखरी पुस्तक थी वो। मैंने शहर के लगभग हर पुस्तकालय और रद्दी खानों में उस पुस्तक की तलाश की है । लेकिन अभी तक वो नहीं मिली।और ये शहर का आखरी पुस्तकलय है । और अगर यहाँ भी वो पुस्तक नही मिली तो ,मैं अपने पिता की लिखी किताब कभी नही पढ़ पाउँगा ।
इतना कहते ही वो युवक की आँख दबी जुबान में रोने लगी। मैंने उसे पास रखे बोतल से पानी दिया और चुप कराने की कोशिस की , थोड़ी देर में वो शांत हुआ , तभी शिव मोहन जी आये और उस युवक का हाथ पकड़ के उठाने लगे ,मुझे लगा वो उस युवक को पुस्तकालय से बहार निकाल रहे है । लेकिन वो उसे लेकर मेरे टेबल के पीछे आ गये । और उधर रखी उन पुरानी
किताबो की ओर इशारा किया । मैंने भी अपनी कुर्सी पीछे घुमा ली,उस युवक ने शिव मोहन को देखा और शिव मोहन ने किताबो की ढेर की ओर इशारा फिरसे किया , और उस युवक ने बिना किसी पल गवाए उन सभी पुरानी किताबो में अपनी पिता की किताब ढूढ़ने  लगा,
मैंने भी उसके काम मे हाथ बटाने की रूचि दिखाई परन्तु मुझे शिव मोहन जी ने रोक दिया । लेकिन उधर उस युवक ने देखते ही देखते सारी पुरानी किताबो की इमारतो को छोटे छोटे घरो में तब्दील कर दिया था। और ये आखरी इमारत बची थी ,और मैं मन ही मन ईश्वर से प्राथना कर रहा था की वो पुस्तक उसको मिल जाये । अचानक से इस युवक ने मुझे जोर से गले लगा लिया और रोने लगा फिरसे , मैंने बड़े स्नेह से उसे हटाया,तो देखा उसके हाथ में एक चमकती किताब थी जिसका नाम हिन्द राजकुमार था, उस पुस्तक को देख के ऐसा लग रहा था मानो किसी जलती आग की ढेर से कोई चमकता सोना बहार निकला हो ।और वो उस पुस्तक को सीने लगाये रोये जा रहा था। वो किताब के हर पन्नो को ऐसे छु रहा था मानो वो अपने पिता को उसमें महसूस कर रहा हो । वो हर अगले पन्ने पर ऐसे जा रहा था जैसे उसके पिता उसको चलना सिखा रहे हो । एक एक लिखे शब्द में वो अपने पिता की सीख ढूढ़ रहा था, और उसे मानो दुनिया का सबसे बड़ा खजाना मिल गया था। वो उस किताब में इतना खोया था की उसे पता भी नही था की आस पास कोई है भी।
दूर से शिव मोहन से जी देख रहे थे थे ये, उनकी बूढ़ी आँखों में जो आज शुकून था वो आजतक मैंने कभी नहीं देखा था ।
काफी देर ये सब युही चलता रहा। तभी शिव मोहन जी ने उस युवक के कंधे पर हाथ रखके कहा। बेटा तुम अपने पिता जी को अपने घर ले जा सकते हो । तुम्हारे पिता चंद्र शेखर जी अक्सर यहा आया करते थे , और यही उन्होंने इस किताब के कई पन्ने लिखे । जाने से कुछ दिन पहले वो ये किताब मुझे सौप गए थे। और कहा था इसे इस पुस्तकालय में कही किसी कोने में रखियेगा और जब कोई इसे । यु बेसब्रो की तरह ढूढ़ने आये तो मेरा बेटा समझ के उसे ये पुस्तक दे दीजियेगा।
तुन्हारे पिता ने कभी कोई अपना पता नहीं बताया था वरना ये किताब में तुम्हारे घर भिजवा कर अबतक अपने इस आखरी क़र्ज़ से मुक्त हो चुका था। मैं शिव मोहन और उस युवक को बस देखता रहा। उस युवक ने शिव मोहन जी को ह्रदय से लगाया और बड़े आदर सम्मान के साथ अपने पिता को लेकर वहा से जाने लगा। आया था वो तूफ़ान बनकर गया था वो एक एहसास बनकर । मैं भी अपने घर की ओर चल पड़ा था , और रस्ते भर पुस्तकालय में बीती घटना को सोचके सुखद एहसास लेते हुए घर पहुच गया था।
दुसरे दिन जब मैं फिर उस पुस्तकालय में गया तो देखा उस पुस्तकालय में ताला लगा हुआ था, और उसपर धूल बैठी हुई थी, मानो बरसो से उस ताले को किसी ने खोला भी ना हो, निचे इमारत के लोगो से इसका कारण पूछा तो जो जवाब मिला उससे मेरे पैरो तले की जमी खिसक गयी
और कुछ लोगो ने मुझे पागल समझ के वहा से जाने तक को कह दिया ।
लेकिन ये आखिर कैसे हो सकता है
कलतक यहाँ एक पुस्तकालय था , और आज लोग कह रहे है की, की जिस इमारत को मैं पुस्तकालय बोल रहा , वो मात्र एक इस पुरानी ईमारत की जर्जर हिस्सा है जिसे आग लगने के कारण बरसो पहले बंद कर दिया गया था।
लेकिन एक बात और थी कोई यहा शिव मोहन जी को क्यों नही जनता था, वो तो यहाँ बरसो से थे ।
काफी देर मैं उसी इमारत के निचे खड़ा रहा , और खुद को ठगा ठगा महसूस करता रहा , और सोच रहा था की मैं इस कहानी का हिस्सा क्यों था,और अगर मैं इस कहानी का हिस्सा नहीं था तो , क्या कोई शिव मोहन नाम का कोई इन्सान था ही नहीं
क्या कल कोई युवक यहा अपने पिता को
ढूड़ने नहीं आया था .? और ऐसे ही कई सवालो के साथ मैं वहा से शहर के नए  पुस्तकालय की ओर बढ़ चला। लेकिन शायद अबसे  मुझे उस किताब की तलाश होगी ।
जिसका नाम 'हिन्द राजकुमार था'

गुलाब...

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