Wednesday, 11 January 2017

पहली बार ' आखरी बार '

कभी कभी लगता है तुम वो हो ही नहीं कहीं
और कभी कभी लगता है तुम यहीं हो कहीं ।

यहीं कहीं आस-पास मेरे
बस मैं तुम्हें देख नहीं पा रहा हूँ
तुम मुझमे अभी भी धड़कती हो
मुझसे ज्यदा ये तुम्हारी नाम की सांसे लेकर धड़कती हैं।

अभी जिंदा है कहीं मुझमे तू ,
बहुत दिनों बाद याद आये हो आज।
झूठ है।
लेकिन आज बहुत याद आये हो ये बात तो सच है ।

अगर तुम मुझे देख रही हो तो मुझे बुला लो
मैं कबसे उसी काफी शाप के सामने
उन्ही गलियों मे
उन्ही रास्तो पर भटक रहा हूँ ।

कोई इधर से तुम्हारी जान पहचान का निकलता ही नही
जिससे मैं तुम्हरा हालचाल पूछ सकू

कई शनिवार के रविवार निकल गए तुम्हारे इंतजार मे
अब तो आ भी जाओ

मैं तुम्हे वही मिलूँगा

जहाँ हम पहली बार मिले थे
जहाँ हम आखरी बार मिले थे ।

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