Saturday, 28 January 2017

कर्म ।

"कर्म"

महाभारत में जब युद्ध दो महायोध्दाओं का था अर्जुन और और कर्ण के मध्य उस दिन  युद्ध से पूर्व श्री कृष्ण जी ने अर्जुन से कुछ वचन लिए । कि आज भले ही इस धर्म युद्ध मे मैं तुम्हारा सारथी हूँ , परन्तु आज तुम मेरे आदेश का पालन करोगे अर्जुन ।
अर्जुन ने सहमती जतायी । कृष्ण जी ने कहा हे अर्जुन एक बार फिर तुम अपने अस्त्र - शस्त्र का पुन: निरीक्षण कर लो , क्योंकि आजका  युद्ध इतिहास बनेगा । और श्री कृष्ण जी ने   रथ रंणभूमि की ओर मोड़ दिया। और उनके सामने थे विश्व के सबसे बड़े धनुर्धारी कर्ण । कर्ण ने युद्ध का एलान किया , परन्तु  कृष्ण जी ने अपना रथ दूसरी ओर मोड़ कर कर युद्ध छोड़ के रथ को तेजी से भगाते हुए जाने लगे ,  ये देख अर्जुन को बड़ा आश्चर्य हुआ ।  और कृष्ण जी से कहने लगे ये क्या कर रहे है माधव ? ये युद्ध के नियम के खिलाफ हैं । आप युद्ध छोड़ के पीठ दिखा के भाग नही सकते । ये देख कर्ण ने भी अपना रथ उसी दिशा मे मोड़ दिया और बारंबार अर्जुन को युद्ध के लिए ललकारने लगे । की कायरो की भाँति युद्ध छोड़ के क्यूँ भाग रहे हो अर्जुन , युद्ध करो मुझसे । अर्जुन ने कई बार कृष्ण जी से रथ रोक करके युद्ध करने की इच्छा जताई परन्तु कृष्ण ने एक बार भी उत्तर नहीं दिया । और वो रथ को तेजी से युद्ध भूमि से दूर ले जाने लगे । इधर पीछा कर रहे कर्ण ने फिर से दहाड़ लगायी , अर्जुन रुको और मुझसे युद्ध करो , आज मैंने अपने मित्र को वचन दिया है कि आज युद्ध में आर पार की लड़ाई लड़के आऊंगा। अर्जुन ने पुन: कृष्ण जी से रथ रोकने का आग्रह किया , इस बार कृष्ण जी ने उत्तर दिया , कि अर्जुन आज मैंने तुमसे कहा था की आज तुम मेरे आदेश का पालन करोगे । अर्जुन चुप हो गए , तभी एकाएक कृष्ण जी ने रथ एक जगह रोक दिया । लेकिन पीछे कर्ण का रथ एक दलदल मे फँस  गया  और उनके हाथ से धनुष छूट दूर गिर गया , और  इससे पहले की कर्ण संभल पाते, कृष्ण जी ने अर्जुन से कहा कि अब तुम कर्ण को युद्ध के लिए ललकारो । अर्जुन ने कहा ये अनीति है, ये धर्म के विरूद्ध है । परन्तु श्री कृष्ण जी ने बात दोहराते हुए यही कहा । अर्जुन ने कृष्ण जी की बात मानते हुए कर्ण को युद्ध के लिए ललकारा , कर्ण तो पहले कुछ समझ नही पाए परन्तु बार बार युद्ध की ललकार सुनकर उन्होंने अर्जुन को उत्तर दिया , ' अभी मैं रथविहीन हूँ , शस्त्रविहीन  हूँ । मैं युद्ध नहीं कर सकता । लेकिन अगर तुम्हे मुझपर प्रहार करना है तो तुम कर सकते हो । मैं अपना रथ का पाहियाँ दलदल से निकालने जा रहा हूँ ।  अर्जुन ने श्री कृष्ण जी को बोला कि किसी निहत्थे पर प्रहार करना युद्ध नीति और धर्म के विरुद्ध हैं । कृष्ण जी ने फिरसे अर्जुन को चेताया कि आज युद्ध से पूर्व क्या वाचन उन्होंने दिए थे । तब अर्जुन ने न  चाहते हुए भी कर्ण प्रहार कर दिया । और कर्ण वहीं घुटनों के बल गिर गए । कर्ण अर्जुन के इस प्रहार की पीड़ा सहन कर रहे थे , परन्तु उनकी आँखों में आंसू नहीं थे । वरन् कुछ प्रश्न थे,  उनकी आँखों में कृष्ण जी से । तब श्री कृष्ण जी ने समय को वहीं रोक दिया । और कर्ण के पास गए और कर्ण को देवलोक ले गए।कर्ण ने वहा एक एक करके प्रश्न पूछने शुरू किए माधव से ,
"क्यूँ मुझपर तब प्रहार कराया जब मैं रथविहीन था , शस्त्रविहीन था । क्यूँ मुझपर अर्जुन से तीर चलवाये जब मैं निहत्था था । "
"क्यूँ मुझे सारी ज़िन्दगी शूद्र पुत्र कहा गया , जबकि मैं एक क्षत्रिय था । "
"क्यूँ मैं इस रणभूमि मं अपनों के विरुद्ध लड़ रहा हूँ "।
क्या यह अनीति नहीं है। क्या ये पाप नहीं है।  क्या यही आपकी धर्मस्थापना हैं। तब श्री कृष्ण बोले ,
"जब भरी सभा मे द्रौपदी का चीर हरण हो रहा था , तब तुम भी सभी की भाँति चुप थे कर्ण ,  ये तुम्हारा पाप था "।
पांडव भले उस समय कुछ नहीं कर पाए , परन्तु उन्होंने पाप के खिलाफ आवाज़ उठाई , और तुम मौन रहे वत्स  , ये पाप था तुम्हारा । जितना पाप दुशाशन ने किया था उतना ही पाप तुमने चुप रहकर  किया था।
"जब अभिमन्यु को चक्रव्यूह में मारा जा रहा था , तब भी तुम चुप थे वत्स , वह भी तुम्हारा पाप था "।
तुमने धर्म का साथ ना देकर इस धर्म युद्ध मे पाप का साथ दिया इसलिए तुम पाप के पक्ष में खड़े हो वत्स , तब कर्ण की आँखों मे आंसू आने लगे जब उन्होंने देखा की जो तीर अर्जुन ने उनपर चलाये थे उसका घाव माधव के शरीर पर भी था । कर्ण ने कहा हे माधव मुझे ले चलिए अपने साथ इस अंतिम समय मे मैं आपको अपना सारथी चुनता हूँ । मुझे मेरे पापों से मुक्त करिए माधव । कृष्ण जी ने कहा मैं हमेशा से तुम्हारा सारथी बनना चाहता था , आज तुमने इन अंतिम क्षणों में मुझे अपना सारथी चुनकर कर तुमने अपने पापो से मुक्ति पा ली है । अब बस तुम्हें इस शरीर को त्याग दूसरे वस्त्र नुमा शरीर को धराण करना होगा । कर्ण ने कहा मैं आपके बताये मार्ग पर चलने के लिए तैयार हूँ, ले चलिए मुझे । कृष्ण जी कर्ण को पुन: रणभूमि में ले आये , और समय को पुन: वहीं से शुरू किया जहाँ पर रोका था । और अर्जुन से कहा अंतिम प्रहार करो कर्ण पर , कर्ण को पाप मुक्त करो अर्जुन । ये तुम्हरा सौभाग्य भी है और दुर्भाग्य भी । और तब अर्जुन ने अंतिम प्रहार कर्ण के कंठ पर किया । और कर्ण की जीवन लीला समाप्त की।

महाभारत के समय में ले जाने का मेरा एकमात्र उद्देश्य ये था कि मैं आपको याद दिला सकूँ  कि कर्म कभी आपको आपके कर्मो से माफ़ी नहीं देता । जैसे कर्म करोगे  वैसा ही फल मिलेगा आपको । जो गलत कर रहा है वो तो पापी है ही , वरन् जो पाप होते हुए देखकर अनदेखा करता है वो भी पाप का उतना ही भागीदार है।
इसीलिए कभी गलत होते हुए न देखे न गलत करें , और अगर उस समय आप गलत के खिलाफ लड़ नहीं सकते तो आवाज़ उठाये । आपकी एक आवाज़ गलत के खिलाफ गलत करने वालों के लिए चेतवानी हो सकती है कि वो ऐसा ना करें, बुराई के खिलाफ आवाज़ उठएँ,आपके साथ के लिए आएंगे लोग पहले आप अपना प्रयास तो करिए , यह मत सोचे की पहले कौन बोलेगा। पहले गलत के खिलाफ आप आगे आये , एकता मैं बड़ा बल है इसबात को समझें ।

No comments:

Post a Comment

गुलाब...

उन्होंने कहा, पूरे अमीनाबाद के लड़के हमपर मरते हैं तुम मानो न मानो वो हमसे बे-पनाह मोहब्ब्त करते हैं और अगर दराख से झुमका भी दिखा दूं तो ...