Friday, 13 January 2017

बेपरवाह ।

बेपरवाह सा मैं सरफिरी सी जो है ये ज़िन्दगी मेरी
बड़ी गुश्ताखियां होती है रास्तो मे

कुछ हसींन चेहरों पर नजरे बार बार पड़ती है
लेकिन ये जो है आँखे मेरी ।
उन हजार चेहरों मे इक तुझे ढूढ़ नहीं पाता
बड़ी खामोसी से चल रही ज़िन्दगी मेरी

हजारो के बीच चुपचाप सा खुदसे बेखबर सा रहता हूँ
जिसको खुद की सुध तक नही रहती
युही कतरा कतरा जिए जा रहा।

सामने एक नहीं दो नहीं तीन नहीं चार हजार रस्ते है
लेकिन तुझ तक जाने वाला ही रास्ता याद नहीं आ रहा ।

अभी कहानी खत्म नहीं हुई मेरी

क्युकी गर इश्क अधुरा हैं
तो कहानी भी अधूरी रहेगी

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