उलझी उलझी सी है ज़िन्दगी मेरी
और फिर भी तुम हर दिन एक नया सवाल खड़ा कर देती हो।
गर जरा सा भी शक हो मेरे ऐतबार पर तो इश्क से पूछलो ,न याकिन हो तो मोहब्बत से बहस करलो
तुम्हे मेरी ये हर सब्र की इन्तहां बता देगी
तुमसे चाहत कितनी है और बेताबी कितनी है सब बता देगी ।
पर तेरी हर नराजगी से बे पन्नाह मोहब्बत है तेरी हर बचकानी हरकतों से इसे बेइन्तहा इश्क है मैं हर पल तुझे तेरी ख़ामोशी से प्यार करता रहा हूँ।
तू जितनी बार मुहँ फेर के गयी है ये पागल दिल उतनी बार तेरे पास अपना प्यार लेके आया है ।
ये बात भी सच है की खुदा से ज्यादा मैंने तेरी इबादत की है ,
शयाद इसीलिए खुदा अब मेरी सुनता ही नहीं।
मांगता अब भी तेरे लिए ही हूँ लेकिन अब वो कहने लगा है,
जिसकी इबादत करता है उसी से मांग ।
जा उसी से थोड़ा सुकून भी मांग ले अपने लिए ,
कबतक यहाँ भटकता रहेगा। घुट घुट के जीता रहेगा।
जबतक सांसे चल रही है थोड़ा अपने लिए भी जी ले
वरना ऊपर आकर फ़रियादे मत करना
शिकायते मत करना की तुझे मैंने ज़िन्दगी नहीं दी थी । तुझे मैंने दिल नहीं दिया था ,
अब जब सबकुछ तूने उसके नाम करदिया तो मैं क्या करू
मैंने तो सबको बराबर दिया है।
लेकिन तूने ही अपनी खुशियों के बदले
उसका गम माँगा था । और तेरी दुआ मे इतनी सिद्दत थी की मैं कभी मना नही कर सका और तू भी कभी आपनी आदतों से बाज नही आया ।
और तेरा ये हल हो गया की तुझे आज इश्क और वफ़ा के आगे कुछ नही दिखयी दे रहा ,
तू सुन भी रहा है मैं तुझसे क्या बोल रहा ।
या हमेसा की तरह उसका नाम लिए जा रहा। और मुझे फिरसे अनसुना किये जा रहा।
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