Sunday, 1 January 2017

जो मैं चाहता नहीं, जो मैं होने नहीं दूंगा ।

पहले तो खूब दर्द देते है ,
एक पल मे सदियों सा तोड़ देते है।

फिर मरहम के नाम पर
कई दर्द और किस्तों मे दिया करते है ।

फिर रूककर मेरे लिए 
दुवाए करते है ,मन्नते मांगते है
सलामती चाहते है हमारी ताकि
जिन्दा रहे हम।

जब एक एक जख्म नासूर बनके पकने लगते है,
तब दूरसे देखके मुस्कुरा के जख्मो पर नमक का स्वाद देखने आते है ।

आब कौन बताये जैसे नमक का कोई स्वाद नहीं होता,
वैसे दर्द का कोई जवाब नहीं होता ।

गमो के शहर मे मैं इकलौता ला इलाज बीमार बना फीरता हूँ ।

आब तो दावा भी बोलने लगी है चला जा यहा से ,
तेरे दर्द का असर मुझपे हो रहा है।

इतनी सिद्दत से तोडा है की ,
जुड़ने मे भी दर्द होता है ।

जैसे शीसा गिरने के बाद टुकड़ो मे बंट जाता है ,
वैसे हे तेरे जाने के बाद मैं टुकड़ो बिखर गया हूँ।

जिससे लोग बस बचकर निकल जाना चाहते है ,
क्युकी टूटा कांच चुभता है शायद।

पर उससे कोई टूटने का दर्द नहीं पूछता,  ना ही पूछता है की तुम कितने दर्द मे कितने टुकड़ो मे तुम बिखरे हो।

कांच जुड़ नहीं सकता टूटने के बाद ,लेकिन शायद मैं जुड़ सकता था अगर इतने दर्द के बाद
तू सुकून का एक लम्हा दे देती ।

मैं भी अपने दर्द से आजाद हो जाता ।
मेरे दर्द पर भी कोई दावा असर कर जाती शायद मेरे दर्द का भी कोई इलाज हो जाता ।

लेकिन तेरे दर्द के साथ अब जिन्दा है सिर्फ जिस्म मेरा ,
जिसमे तेरे नफरत की बड़ी तेज दुर्गन्ध आती है।

अब मुझमे इतना जूनून-ए-नफरत है की
चाहू तो पूरा प्यार का जंगल जला दूँ ।
पूरी काएनात मे काला राख़ फैला दूँ।

लेकिन मुझमे तेरे जितनी नफरत कहाँ ,
मुझमे मेरे प्यार मे कहीं न कहीं तू अब भी जिन्दा है। 
इसीलिए मैं नफरत करना नहीं सीखना चाहता।

क्युकी उसके बाद मेरे अन्दर से तेरा बचा वजूद मिट जायेगा!

जो मैं चाहता नहीं ,
जो मैं होने नहीं दूंगा।

2 comments:

गुलाब...

उन्होंने कहा, पूरे अमीनाबाद के लड़के हमपर मरते हैं तुम मानो न मानो वो हमसे बे-पनाह मोहब्ब्त करते हैं और अगर दराख से झुमका भी दिखा दूं तो ...