Monday, 10 April 2017

माला ले लो


सच तो ये हैं की हम कुछ लिखना ही नहीं चाहते। अरे क्यों लिखे ,घंटों लगते हैं सदियां गुजर जाती है। इतना उलझ जाओ की खुद को अल्फाजों की दुनिया से वापस लाने में कई -कई सदियां गुजर जाती है। और भी काम है हमें,जीना भी है।

तुम्हें क्या पता कहानी कैसे बनती है,माला कैसे बनती है। पैहले एक पहर दिनमे सो कर, रातों को सारे पहर जगना पड़ता है। सुई चुभती हैं हाथो में,सीने में। एक एक शब्द उधार लाते हैं गमो
के बाजार से लाखों की कर्जदारी हो गयी है खुद मेरी। फिरभी जज्बात के मालिक की चार बात सुनो ,उससे हर बार बहस मेरी सिर्फ इस बात पर होती है की उसकी दी हुई जज्बातों की सूत में जब-जब एक-दो-चार पूरे पन्ने की सार तक की कहानी बुनना चाहो तो वह टूट क्यों जाती है। हर बार मजबूत रिश्तों के नाम की सूत थमा देता है , जो बहुत कमजोर साबित होते है कहानी बुनते समय।
दाम के नाम पर दरिया भर आँशू देकर आता हूँ,उसमे भी वफ़ा के साहूकार का हमेसा यही कहना होता है कि आँशूओ में तेरे दर्द की कमी हैं , और नमी भी थोड़ा ऊपर नीचे है।

लेकिन पूरा बाजार जानता है की कैसे मैं सूखी आँखों से एक-एक गमों के मोती चुन-चुन कर लाता हूँ, सीने से लगाकर उसकी आंशूओ की खनक सुनता हूँ।

आजकल बाजार भी बड़ा मंदा है,और खरीददारों को माला तुरंत चाहिये ,डूबने के उतावले होते है सब। वो एक-एक मोती देखके अपने गम के नज़ारिए से लेते है। कोई मोती पसंद ना आये तो पूरी माला खुलवा कर,रुला कर मोती बदलवा देते है। फिर दूसरे मोती में फिरसे दर्द की नयी खनक भरो

दाम के नाम पर वाह वाह करके चले जाते है, ये धंधा घाटे का हो चला है।
नुकसान की परवाह तो हम माला बनाते समय करते ही नहीं,लेकिन जब जमा पूंजी के नाम पर शुकून भी नही मिलता तो बड़ा ठगा-ठगा सा महसूस होता है।
कोई सरकारी छुट्टी की गुंजाईश भी नहीं इस कारोबार में,नींदो में भी दुसरो के सपनो को जीते रहते है।

जबदस्त होड़ मची है बुनाई क्र कारखाने में, सब एक-दूसरे की कारीगिरी को पीछे छोड़ना चाहते है, सब नए-नए दर्द,मोती ढूढ़ कर ला रहे है।
लेकिन सब मोती खरीद कर लाते उसी बाजार से है,वहा बाजार के साहूकार के पास सबके बही खाते है।
बड़े कर्ज़दारो में गुलज़ार,साहिर और अख्तर साहब का नाम सबसे ऊपर है।
बड़े मोतियों के खरीददार है ये सब,साहिर साहब का खाता बंद करदिया गया है, लेकिन बाजारों में उनकी खोज होती रहती है, तफ्तीश तब तेज हो जाती है जब उनकी माला के मोती इधर उधर कही बिखरे मिलते है।

कल साहूकार चौराहे पर खड़ा होकर चिल्ला रहा था,भले ही साहिर कर्ज़दार थे लेकिन कीमत हर मोती की वो सही लगाते थे। तुम नौसेखियों की तरह नहीं थे वो । मेरा क़र्ज़ भी बढ़ता चला जा रहा है, कल ही साहूकार के आदमी आये थे हिसाब मांगने मैंने भी हुनर दिखाया अपनी कलम का ।
नयी-नयी चमचमाती माला थमा दी, पूरी गली,मेरी गली से रोते हुए गए है।

चलो जाओ सब धंधा करने दो मुझे।
माला ले लो
भाई माला ले लो

नए दर्द नए शब्द से बुने हुए है,नयी-नयी हसरते नयी-नयी चहतो से बुने हुए है।
बाबू जी एकबार देखिये तो, पढ़िए तो एकदम नया है, पूरे बाजार से अलग है ये माला।

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