Wednesday, 19 April 2017

पूरा पढ़िये


स्नैपचैट का बवाल हो या फिर सोनू निगाम का अपना मिज़ाज हो ये इंडिया है भैया,यहा फ्रीडम ऑफ़ स्पीच का पूरा फायेदा उठायेगे और बोलेगे हम ! लेकिन जल्दी से जल्दी बोलने की चेष्टा में हम अक्सर अपना खुद का विचार बिना बनाये बोलने लगते है! जिससे आपस में भेद मतभेद पैदा हो जाते हैं ! इंडिया मे लोगो को बोलने की जल्दी होती , और पूरा पढ़ने का समय नहीं मिलता। इतिहास गवाह है। आधे से ज्यादा दंगे,मार पीट , बवाल इसी कारण होता है की हमें पूरी बात न पाता होते हुए भी कही भी बोलना,मारना पीटना शुरू करदेते है । एक कार वाले ने साइकिल वाले को टक्कर मारी पूरी भीड़ कार के सीसे के साथ कार चलाने वाले को भी तोड़ देती है । क्युकी ये इंडिया है । भावनाओं में बह जाते है हम । फिर बाद में साइड मे खड़े भाई साहब मामला ख़तम होने के बाद बताते है गलती साइकिल वाले की थी , गलत साइड से साइकिल ले आया था, लेकिन भीड़ का क्या उन्होंने अपना हाथ साफ़ किया और चल दिए,सबको अपना हाथ सफा करना होता है । आपको क्या लगता है रोड पर जब किसी को चोट लगती है तो लोग बचाने क्यों नही जाते ? क्युकी उन्हें पता होता है बचाने जायेगे , दो चार आठ खा के आयेगे, और सबका ऐसा मानना है की भीड़ का कोई रूप नहीं होता ।एक किस्सा है , हमारे गली में एक जुम्मन चाचा रहते है उनका मानसिक संतुलन कहते है ठीक नहीं लेकिन दीन ईमान के पक्के हैं पांच वक़्त की नमाज पढ़ते हैं! एक दिन वो पास के अम्बे माई के मंदिर मे घुस गए दरवाजा खोल के ! एक महापुरुष ने देख लिया! कसम से बता रहा हु । ऐसे जुम्मन चाचा को उनकी सर्ट पकड़ के घसीट के लाये है की ,जुम्मन चाचा बेचारे कांप गए दो चार जुम्मन चाचा को लगा दिए , एक दो सज्जन आये मामला रफा दफा हुआ, वरना उसदिन छोटी सी गली में कर्फ्यू लग ही गया था समझो ,मैं बगल वाली पान की दुकान से घर की पूजा समग्री के लिए साफ सुथरा पान लेने गया था, पान लिया मंदिर में गया ,आज बता रहा हूँ मैं उस समय चप्पल उतारना भूल गया था ,अन्दर पहुच कर जल्दी जल्दी चप्पल को हवाई जहाज के जैसे बहार फेंका, वरना पुजारी जी दादी जी से बता देते तो पान लाने की शाबासी की जगह कुटाई हों जाती हमारी, कोई बात नही है वैसे मैं हिन्दू हूँ ! जुम्मन चाचा की तरह पांच वक़्त का नमाजी आपवित्र नहीं,और हाँ सुबह मैंने नास्ते में अंडा खाया हुआ था । लेकिन मेरा ऐसा मनना है की मंदिर मे जाने लिए मन पवित्र होना चाहिये ,शारीर नहीं।खैर मेरी छोड़िये । मैं मंदिर जाके जुम्मन चाचा का अधूरा कम पूरा किया,हाथ जोड़ा घंटे की डोर बांधी , उसे दो बार बजाया और प्रसाद लिया ,दो बार लिया प्रसाद में लाडू था इसलिए दो बार नही लिया वो  जुम्मन चाचा के लिए भी लेना था ना इसलिए उनके हिस्से का भी लिया ,वो अभी भी मंदिर से दूर खड़े थे । हम वापस आये जुम्मन चाचा को प्रशाद दिया जुम्मन चाचा ने पूछा ठीक से बंधा है न ? मैंने हां में सीर हिलाया। और घरको हो लिया
जैसे हमारी गली में हुआ ठीक वैसे ही
हमारे आस पास हम हमेसा देखते है की मामला सुई के जैसी भी न होती लेकिन पूरी जानकारी के ना होने के आभाव में तलवारे चल जाती है । बाद में ज़मी पर एक रंग बिखरा देख के पता चलता है, ये तो हमने अपनों का ही खून बहा दिया । इसलिए मित्रों पूरी बात सुनिए , आच्छे से सुनिए,अपना विचार बनाइये , फिर मुहँ से खोलिए । शब्दों के तीर चलाये । क्युकी तीर कमान से निकलने के बाद वापस नहीं आते , लेकिन हम सोच समझ के अपना निशाना ठीक से जरुर लगा सकते है । और अगर ऐसा करेगे तो शायद बहुत कम ही तीर चलाना पड़े।

और हाँ इसे पूरा पढ़िये ।

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